शब्दों का मौन
जब शब्द जन्म लेना बंद कर देते हैं, तब लेखक सबसे अधिक बेचैन होता है। यह कविता उसी सृजनात्मक मौन, भीतर की उदासी और प्रकृति से संवाद के माध्यम से लेखन की रहस्यमयी पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है।

जब शब्द जन्म लेना बंद कर देते हैं, तब लेखक सबसे अधिक बेचैन होता है। यह कविता उसी सृजनात्मक मौन, भीतर की उदासी और प्रकृति से संवाद के माध्यम से लेखन की रहस्यमयी पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है।
“चुनरिया हो गई मैली रे” एक भावपूर्ण कविता है जो जीवन के संस्कारों, मोह-माया, आत्मग्लानि और नैतिक चेतना का मार्मिक चित्रण करती है। पढ़ें यह संवेदनशील काव्य रचना।
मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।
लेखक केवल शब्द नहीं लिखता, वह अपने भीतर उमड़ते भावों को स्याही में घोलकर काग़ज़ पर उतारता है। कलम उसकी भावनाओं का वाहक बनती है और कोरा काग़ज़ अहसासों का सजीव संसार। यही लेखन श्रोताओं के दिल तक पहुँचकर अपनी अमिट छाप छोड़ देता है।
लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा का संवाद है। लिखिए क्योंकि शब्द सुकून देते हैं, सपनों को पहचान देते हैं और आपको आपकी कहानी का रचनाकार बनाते हैं।