लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त

पुरानी पुस्तकों, पांडुलिपियों और शब्दों के प्रतीकों के बीच विचारमग्न साहित्यकार का कलात्मक दृश्य, जो भाषा, समय और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाता है।

प्रो. डॉ. मनु

तुम्हारा वादा
मेरे लिए
किसी किताब का
सफ़ा नहीं,
बरसों से प्यासे पड़े
कुएँ पर झुकता हुआ
पहला बादल है।

अब जब कोई
लफ़्ज़ मेरे सामने आता है,
मैं उसके मायने से पहले
उसकी पेशानी पर
लिखी हुई
उम्र पढ़ता हूँ।

हर हुरूफ़
अपने अंदर एक
मौसम छुपाए बैठा है,
जैसे पेड़ की छाल में
कई बरसों की बारिश
महफ़ूज़ रहती है।

मैं अब फूल की
ख़ुशबू से आगे बढ़कर
उस मिट्टी की तलाश में हूँ
जहाँ उसकी पहली
जड़ उतरी थी।

परिंदे की उड़ान
जितनी दिलकश है,
मगर उसके लौटने की फ़ितरत उससे भी ज़्यादा है;
लफ़्ज़ भी आख़िर
अपनी जड़ों की तरफ़
लौटना चाहते हैं।

कभी कोई मायना
नदी की तरह
सामने से गुज़र जाता है,
और उसकी व्युत्पत्ति
पहाड़ों में छुपा हुआ
उसका सोता निकलती है।

मैं अब
अल्फ़ाज़ को छूता नहीं,
उनकी धड़कनों पर
कान रखता हूँ।

किसी पुराने
दरख़्त की तरह
हर लफ़्ज़ अपने तने में
कई ज़मानों के
निशान सँभाले खड़ा है।

समंदर की सतह पर
चमकती हुई धूप की तरह
मायना दिखाई देता है,
मगर उसकी अस्ल गहराई
नीचे ख़ामोश पड़ी रहती है।

तुम्हारे इस वादे ने
मुझे यह हुनर दिया है
कि मैं पत्तियों से नहीं,
जड़ों से गुफ़्तगू करूँ।

अब हर लफ़्ज़
एक अलामत है,
और हर अलामत के पीछे
वक़्त, तहज़ीब और इंसानी तजुर्बे का एक पूरा
जंगल खड़ा है।

मैं जब भी
कोई नया शब्द सीखता हूँ,
मुझे ऐसा लगता है
जैसे किसी अँधेरे जंगल में
एक और चराग़ जल उठा हो।

लेखक के बारे में


प्रो. (डॉ.) मनु
समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि, ग़ज़लकार, चिंतक एवं शिक्षाविद् हैं। हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियों सहित एम.फिल. एवं पीएच.डी. से अलंकृत प्रो. मनु की रचनाएँ संवेदना, विचार और भाषिक सौंदर्य का उत्कृष्ट संगम प्रस्तुत करती हैं।वर्तमान में वे केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर हैं तथा भारत सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय एवं खान मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य हैं। साहित्य, शिक्षा और राजभाषा हिन्दी के संवर्धन में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनकी लेखनी शब्दों के माध्यम से मनुष्य, समाज और समय के गहरे संबंधों को उजागर करती है।

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