उफनते सागर के किनारे खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति अपनी परछाई को निहारता हुआ, समय, अस्तित्व और जीवन के बदलते किरदारों पर मनन करता हुआ।

किरदार

हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।

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पुरानी पुस्तकों, पांडुलिपियों और शब्दों के प्रतीकों के बीच विचारमग्न साहित्यकार का कलात्मक दृश्य, जो भाषा, समय और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाता है।

लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त

प्रो. डॉ. मनु की कविता “लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त” शब्दों, अर्थों और उनकी ऐतिहासिक जड़ों की एक गहन साहित्यिक यात्रा है। यह रचना बताती है कि हर लफ़्ज़ अपने भीतर समय, संस्कृति और मानवीय अनुभवों का एक पूरा संसार समेटे रहता है।

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धुंधले सांध्य वातावरण में एक भारतीय महिला अकेली खड़ी है। उसके पास दलदल में खिला एक कमल दिखाई दे रहा है, जो देह और आत्मा के संघर्ष का प्रतीक है। पृष्ठभूमि में चट्टानें, बहता जल और धुंध आत्मबोध, तन्हाई और अस्तित्व की गहन यात्रा को दर्शा रहे हैं।

प्राण प्रतिष्ठा

प्राण प्रतिष्ठा” एक गहन प्रतीकात्मक कविता है, जिसमें देह, आत्मा, यथार्थ और तन्हाई के बीच संघर्ष को सशक्त बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। यह रचना मनुष्य के अस्तित्व, आत्मबोध और भीतर सुलगती मौन पीड़ा की मार्मिक पड़ताल करती है।

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थका हुआ व्यक्ति शांत वातावरण में बैठा, सामने हल्की रोशनी के साथ सुकून और ठहराव का प्रतीकात्मक दृश्य

मौत का आलिंगन

यह कविता जीवन के संघर्ष, थकान और मृत्यु के सुकून भरे आलिंगन को गहराई से प्रस्तुत करती है। इसमें दर्द, जिम्मेदारियां और अंततः मिलने वाली शांति का ऐसा चित्रण है, जो पाठक को सोचने और आत्ममंथन करने पर मजबूर कर देता है।

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भागती जिंदगी और खालीपन को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें समय की कमी, धन की दौड़ और सुकून से दूर होता आधुनिक मनुष्य दिखाई देता है

खाली हाथ जाना है…

यह कविता आधुनिक जीवन की भागदौड़, दौलत की अंधी दौड़ और सुकून से दूर होते इंसान की विडंबना को उजागर करती है। “मेरी-मेरी” में उलझे मनुष्य की मानसिकता और खोते मानवीय संबंधों पर यह एक गहरी, आत्ममंथन कराती हुई टिप्पणी है।

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ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

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सुर संगम साथ मिले

कविता मानवीय हृदय की उन गहरी इच्छाओं को प्रकट करती है जो भौतिक सुख-संपदा से परे, आत्मिक शांति और सच्चे प्रेम की खोज में हैं। कवि ने “प्रारम्भी नेह” में जीवन को एक ऐसे वन के रूप में देखा है जहाँ वह चंदन जैसी सुगंध और गुलशन जैसी सुंदरता चाहता है, परंतु उसे एहसास है कि धन और वैभव उसके साथ नहीं रहेंगे। इसलिए वह जीवन में सुर-संगम अर्थात् आत्मिक सामंजस्य की चाह रखता है।

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