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गणित और जिंदगी

खिड़की के पास विचारमग्न बैठा व्यक्ति, आसपास गणितीय प्रतीक और नोटबुक के साथ जीवन और रिश्तों के गणित पर चिंतन करता हुआ।

प्रतिभा दुबे

जीवन के गणित का कुछ यूँ ही रहा हाल,
रिश्तों के गुणा-भाग के लिए मन करे सवाल।।

अनगिनत भावों का रखा जोड़-घटाव,
शून्य-सा लगता फिर भी जीवन का बहाव।।

होती गणित में जैसे दशमलव का भाव,
ज़िंदगी में रहा लोगों का उतना ही सुझाव।।

इस गुणा-भाग का शेष अनंत जब हो जाता,
तब जीवन के गणित का अर्थ समझ आता।।

लगे सरल करने हम अनसुलझे प्रश्नों को अपने,
दृष्टिकोण उलझने से गणित विफल हो जाता।।

शून्य दस्तक देता जब विचारों के जीवन में,
तब जोड़-घटाव का महत्व कहाँ रह जाता।।

अच्छा है जीवन को गणित की तरह समझना,
हर सिक्के के हैं दो पहलू, मैं ये सोच थम जाता।।

गणित है तब तक, जब तक तुम जीवन चाहो,
शून्य के महत्व को समझो, तब जीवन अनंत हो जाता।।

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