
डॉ शशि कला लढ़िया
गौरैया,
तुम क्यों नहीं रहने देतीं
मुझे उदास?
खिड़की पर आ-आकर,
फ़ुर्र से उड़ जाती हो,
नन्ही चोंच में
न जाने कहाँ से
ढेर से तिनके
दबा लाती हो,
जिनसे बनाओगी
तुम अपना घोंसला।
हाँ!
इन तिनके-तिनके से
दर्दों ने ही तो
उजाड़ा है
मेरे मन का घोंसला।
मैं कहाँ से लाऊँ
तुम-सी ऊर्जा,
चपलता,
आशा?
उदासी की कैद में
मेरा यह अशक्त मन
सुनता है तुम्हारी चहक,
देखता है तुम्हारा फुदकना।
चाहती हूँ,
खुद को
विलीन कर दूँ तुममें।
क्या इसीलिए आती हो तुम?
कि मैं उदास न रहने पाऊँ,
दुनिया की हर पीड़ा को
तुम्हारी चपल चहक में भूल जाऊँ?
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