फोन हाथ में लिए खिड़की या दरवाज़े के पास खड़ी एक उदास महिला, रिश्तों में बढ़ती भावनात्मक दूरी को दर्शाता दृश्य।

दूरी की पहली आहट

‘दूरी की पहली आहट’ एक भावनात्मक लेख है जो रिश्तों में धीरे-धीरे बढ़ती दूरी, बदलते व्यवहार और भीतर जन्म लेती बेचैनी को गहराई से उकेरता है। यह कहानी उन अनकहे पलों की है, जब रिश्ता टूटता नहीं, बस धीरे-धीरे दूर होने लगता है।

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खिड़की पर तिनके लिए बैठी एक नन्ही गौरैया, जो आशा और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक दिखाई दे रही है।

गौरैया

खिड़की पर आकर चहकती गौरैया केवल एक पक्षी नहीं लगती, बल्कि जीवन की जिद और आशा का जीवंत रूप प्रतीत होती है। नन्ही चोंच में तिनके दबाए वह जैसे हर बार याद दिलाती है कि टूटे हुए घोंसले भी फिर से बसाए जा सकते हैं। उसकी चपल उड़ान और निरंतर प्रयास उस मन से संवाद करते हैं, जो उदासी और पीड़ा के बोझ तले थक चुका है। यह कविता गौरैया के माध्यम से जीवन, आशा और भीतर फिर से घर बनाने की इच्छा को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करती है।

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तन्हाई: भीड़ में खोई आत्मा

तन्हाई…

यह कविता “तन्हाई” इंसान के उस दर्द को उजागर करती है, जब वह भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला महसूस करता है। इसमें जीवन के संघर्ष, टूटे सपनों और भावनात्मक खालीपन को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त किया गया है।

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कुछ रंग ऐसे भी… | रिश्तों, धोखे और ख़ामोशी पर विचारशील कविता

कुछ रंग ऐसे भी…

यह कविता जीवन के उस कैनवास की कथा है, जहाँ धोखे और बनावटी रंग इतने फैल जाते हैं कि प्रेम, अपनेपन और आत्मा के रंग खो से जाते हैं, और बचती है केवल ख़ामोश उदासी।

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कमरे में अकेली व्यक्ति खिड़की के पास बैठा, धुंधली रोशनी में खुद को देखता हुआ, मन में उदासी और अकेलेपन का भाव। कमरे में शांत वातावरण, हल्की धुंध और बांसुरी की कल्पित धुन महसूस होती है।

एकांत की तलाश

आज मन उदास है। रोशनी चुभती है, सितारे दिखना भी नहीं चाहते। वह अकेलेपन में बांसुरी की धुन में शांत होना चाहता है, जहाँ कोई सुनने वाला नहीं और सिर्फ यादें साथ हों।

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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इंतज़ार

ज़िंदगी ने बस इतना ही सिखाया है कि इंतज़ार भी एक उम्र माँगता है। न जाने कितनी रातें, कितने दिन तेरी याद में गुज़र गए। खामोशी बहुत कुछ कहती है, पर जब दिल नहीं समझ पाता, मैं फ़िज़ाओं के बीच आकर तेरे दीदार की आस लगा बैठता हूँ। अब तो ये हवाएँ भी थकी-सी लगती हैं .मानो ये भी चाहती थीं कि एक दिन मेरी खामोशी मुस्कान में बदल जाए।

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काश के फूल

डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा काश! मैं फूल होती काश कातुम्हारे मानस-पटल परपड़ी स्याह परतों परअपने नर्म-नर्म फूलों सेरुई के फाहे-सा ढक देती। ख़्वाहिशें जो तुम्हारीदबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों केउड़ते-हिलते फाहों सेसजा देती। बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरहकाश के फूल भी,पर शरद ऋतु आतेकहाँ रोक पाते खिलनेसे ख़ुद को! तेरे मन में भी…

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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