
रश्मि पटेल, मुंबई
ग़मों की जमीं
कोई ख़ुशी का मचान नहीं है
क्या हूँ, क्यों हूँ मैं
मुझें अपनी पहचान नहीं है
काश उड़ पाता कहीं ऊंचा
अपने यह पंख फैलाकर
अफ़सोस मेरे मुकद्दर में कहीं आसमान नहीं है
भीड़ मे रहकर भी रहीं हूँ सदा तन्हा मैं
मेरे लिए किसी भी राह में कोई कारवां नहीं है
ग़म छिपाने की हर अदा मालूम नहीं मुझ को
देखो मेरी हसीं में कोई ग़म का निशा नहीं है
अब तो हर सुबह गुजरेगी
ऐसे ही आपस में गले मिलकर
अब तो कोई भी मेरे और ग़म के दरमियान नहीं हैं
इस दुनियां में सभी जीते हैं
कुछ आरजू लेकर
अपना दिल हैं पत्थर का
इसका भी कोई अरमान नहीं हैं l
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