हिज्र, सब्र और बदलते रिश्ते

अकेली महिला की उदास अभिव्यक्ति – हिज्र और दर्द को दर्शाती हिंदी ग़ज़ल इमेज खिड़की के पास बैठी भावुक महिला

दिल से निकली ग़ज़ल

कंचनमाला अमर “उर्मी” नई दिल्ली

ख़ुद को ही मैं दाद देती ख़ुद की हिम्मत के लिए,
वक़्त को बांधा जो मैंने इक मोहब्बत के लिए।

सब्र में दिल आ गया ग़म-ए-हिज़्र जो लंबा रहा,
कुछ बचा ना रह गया तुमसे शिकायत के लिए।

ज़ख्म मत ही खोलिए, मरहम नहीं मिलता यहाँ,
लोग बैठे हैं यहां अपनी तिजा़रत के लिए।

वक़्त बदला तुम भी बदले है यही दस्तूर भी,
कौन रुकता है फ़क़त उल्फ़त की आदत के लिए।

नर्मियां लहज़े की तेरी बरग़लाया है मुझे,
यह भी इक अंदाज़ है मतलब की निस्बत के लिए।


लेखिका के बारे में-

कंचनमाला ‘अमर’ (उपनाम: उर्मी) एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार एवं शिक्षिका हैं, जो नई दिल्ली के राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान विषय का अध्यापन करती हैं। उन्होंने M.Sc. (रसायन शास्त्र), M.Ed, M.A (कंठ संगीत) तथा B.A (कत्थक नृत्य) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में शिक्षा शास्त्र में शोधरत हैं।
उनका एकल काव्य संग्रह “इसी रहगुज़र से” सहित कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी नव उदय साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

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8 thoughts on “हिज्र, सब्र और बदलते रिश्ते

  1. कंचन जी आपकी ग़ज़ल पढ़ी जिंदगी के सफ़र में थके हुए राही को जैसे सुकून मिल गया हो ।शानदार

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