वृंदावन की पुकार

“वृंदावन में बाँके बिहारी मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की भीड़ और आध्यात्मिक वातावरण” “वृंदावन: जहाँ हर कदम पर भक्ति और आत्मिक शांति का अनुभव होता है”

एक ऐसी यात्रा, जहाँ मैंने खुद को पाया

सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

यात्राएँ केवल स्थान परिवर्तन नहीं होतीं, वे आत्मा के भीतर घटित होने वाली सूक्ष्म हलचलों का विस्तार होती हैं। कुछ यात्राएँ योजनाबद्ध होती हैं और कुछ मानो किसी अदृश्य शक्ति का आमंत्रण। मेरी वृंदावन यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी—एक साधारण इच्छा से प्रारंभ होकर एक अलौकिक अनुभूति में परिणत हो जाने वाली।

यह सब एक सहज बातचीत से शुरू हुआ। मित्रों के साथ लौटते समय अचानक वृंदावन जाने की बात उठी, और जैसे ही यह शब्द कानों में पड़ा, मन ने बिना किसी तर्क के उसे स्वीकार कर लिया। योजनाएँ बनीं, उत्साह उमड़ा और यह निश्चय किया गया कि अपना जन्मदिवस 23 सितंबर वृंदावन की पावन भूमि पर मनाया जाएगा।

परंतु जैसे हर गहरे मिलन से पहले एक विरह आता है, वैसे ही इस यात्रा के आरंभ में भी एक बाधा आई ट्रेन निरस्त हो गई। उस क्षण जो निराशा थी, वह केवल एक यात्रा के रुक जाने की नहीं थी, बल्कि जैसे मन के किसी गहरे आग्रह का अधूरा रह जाना था। समय बीता, पर भीतर का आकर्षण कम न हुआ। अंततः, बिना किसी शोर के, एक बार फिर यात्रा का निर्णय लिया गया। इस बार जैसे संकल्प में दृढ़ता थी और शायद उसी दृढ़ता ने मार्ग प्रशस्त किया।

जब हम मथुरा पहुँचे, तो एक अनजानी-सी अपनत्व की अनुभूति हुईजैसे लौटकर अपने ही किसी भूले हुए घर में आ गए हों। और जैसे ही वृंदावन की धरती पर कदम रखा, एक अव्यक्त शांति ने मन को घेर लिया। वहाँ की हवा में एक अलग ही स्पंदन था-एक ऐसा आकर्षण, जो शब्दों से परे था।

सबसे पहले हम पहुँचे बाँके बिहारी मंदिर। वहाँ की भीड़ मानो श्रद्धा का सागर थी। लोग उमड़ते चले आ रहे थे. हर किसी की आँखों में एक ही आकांक्षा, एक ही पुकार। किसी प्रकार हम भीतर पहुँचे, परंतु नियति जैसे उस दिन कुछ और ही लिख चुकी थी। जैसे ही मेरी दृष्टि उस ओर उठी, पर्दा गिर चुका था। उस दिन का अंतिम दर्शन हो चुका था और मैं उन्हें देख न सकी।

मंदिर से बाहर निकलते हुए जो अनुभूति थी, वह केवल निराशा नहीं थी. वह एक अधूरे मिलन की पीड़ा थी। आँखों में नमी थी और मन में एक मौन प्रश्न “क्या इतना ही था?”

परंतु वृंदावन में कोई भी भाव अधूरा नहीं रहता। अगले ही दिन, एक अटूट विश्वास के साथ मैं पुनः उसी मंदिर में पहुँची। इस बार मन में केवल एक ही संकल्प था मैं केवल दर्शन नहीं करूँगी, मैं संवाद करूँगी।

भीड़ आज भी थी, पर भीतर कुछ बदल चुका था। जैसे ही मैं भीतर पहुँची, पास खड़े एक व्यक्ति ने सहज ही कहा “देखिए, बिहारी जी आपको देख रहे हैं।” और उसी क्षण मेरी दृष्टि उनकी दृष्टि से मिली।

वह क्षण समय से परे था।

आँखों से अश्रु बहने लगे, पर वे अश्रु दुःख के नहीं थे वे किसी गहरे मिलन के साक्षी थे। आश्चर्य यह था कि जहाँ हर कुछ क्षणों में पर्दा गिर जाता है, वहाँ उस दिन, उस समय, जब तक मैं वहाँ रही, पर्दा नहीं पड़ा। जैसे उस मिलन को स्वयं उन्होंने भी रोकना नहीं चाहा।

उसके बाद यात्रा केवल एक क्रम नहीं रही, वह एक अनुभूति बन गई। राधा वल्लभ मंदिर में भक्ति का स्पर्श, राधा रमण मंदिर, बरसाना की गलियों में एक अजीब-सी आत्मीयता और यमुना नदी के तट पर एक गहन शांति राधा कुंड, निधिवन हर स्थान जैसे भीतर कुछ खोलता चला गया।

बरसाना में तो ऐसा लगा मानो यह भूमि अनजानी नहीं है। हर गली, हर मोड़ परिचित-सा लगा, जैसे कोई कह रहा हो “आ गईं तुम!” वहीं एक पंडित ने बिना कुछ कहे मुझे बुलाया और राधा रानी के चरणों से श्रृंगार का प्रसाद मेरे हाथों में रख दिया। वह केवल प्रसाद नहीं था वह स्वीकार था।

यमुना किनारे बैठकर जब
“अपने ही रंग में रंग ले, मेरे श्याम सांवरे…”
मन में गूँजा, तो लगा मैं सचमुच रंग गई हूँ।

गोपेश्वर महादेव मंदिर में एक और अद्भुत अनुभव हुआ गेंदा फूलों की एक माला उछली और सीधे मेरे गले में आ गिरी। उस क्षण ने जैसे इस पूरी यात्रा को एक रहस्यमय आयाम दे दिया।

लोग कहते हैं कि वृंदावन की रज साथ नहीं लाई जाती, पर मैं यमुना नदी के तट से थोड़ी-सी मिट्टी अपने माथे से लगाकर और कुछ अपने साथ लेकर लौट आई। वह केवल मिट्टी नहीं थी वह उस अनुभव का अंश थी, जो शायद जीवन भर साथ रहने वाला था।

चार-पाँच दिन कब बीत गए, यह पता ही नहीं चला। वापसी के समय ट्रेन में एक अजीब-सी खामोशी थी। शब्दों की आवश्यकता नहीं थी आँखों में जो था, वही सब कह रहा था। ऐसा लग रहा था हम कुछ छोड़ आए हैं… या शायद अपना एक हिस्सा वहीं छोड़ आए हैं।

आज भी, समय बीत जाने के बाद, वह अनुभूति वैसी ही जीवित है। वृंदावन अब केवल एक स्थान नहीं रहा वह एक पुकार है, एक स्मृति है, एक अधूरा-सा पूर्ण प्रेम है।

और मन आज भी उसी प्रतीक्षा में है कि फिर कभी वह अदृश्य आमंत्रण आए और मैं पुनः उस भूमि पर लौट सकूँ, जहाँ मैंने केवल दर्शन नहीं, स्वयं को पाया था।

चार दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।
वापसी के समय हम साथ थे, पर खामोशी बोल रही थी।
आँखों में आँसू थे और मन में एक ही भाव- “हम कुछ छोड़ आए हैं वहाँ…”

आज भी लगता है-
मेरा एक हिस्सा वहीं रह गया है…
उस धूल में, उन गलियों में, उन कुंजों में…

और मैं… बस उसी पुकार की प्रतीक्षा में हूँ-
कि फिर बुलावा आए… और मैं लौट जाऊँ
अपने उस अधूरे, पर पूर्ण प्रेम की ओर।

“वो मिलन भी तेरा, वो विरह भी तेरा सब कुछ तुझमें समाया है,
वृंदावन की उस रज में, मैंने खुद को ही पाया है।”
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