
सुनीता मलिक सोलंकी ‘मीना’ मुजफ्फरपुर
बुझ रही अब लौ जीवन की हारकर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
मेरा हृदय प्रेम का है रंगमंच,
न फरेब किसी से, न कोई प्रपंच।
जीवों से लेकर मनुष्यों तक,
प्रेम की संदेशवाहिनी, प्रचारक।
मैं जिऊँ पर-पीड़ाओं से आहत होकर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
रंगमंच पर नित होते नर्तन,
ज़िंदगी चल रही किस संदर्भ?
कभी हँसाती, कभी रुलाती,
क्या छिपा है अंतर्मन का द्वंद्व?
अभिनय तेरा छलता रह-रहकर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
धूमिल होती-सी कुछ यादें,
हिल रही रिश्तों की बुनियादें।
घड़ी-घड़ी रंग बदलते वे,
जिनसे होती थीं मुलाकातें।
हुए एकाकी तो मन हुआ यायावर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
सुंदर थे तुझ संग मेरे प्रेम-रंग,
वो तेरी फुर्सत के कुछ पल।
कायनात रंगीन हो जाती थी,
बैठ सुनाते थे बीते हुए पल।
एकल संवादों में तुम रहे ठहरकर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
अपना किरदार निभा गए,
हमें कितना मौन कर गए।
बहुत कुछ यूँ तो था कहना,
तुमने चुना नेपथ्य में रहना।
देखा एक किरदार हमने भी जीकर,
तुम नेपथ्य में, मैं बैठी रंगमंच पर।
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भावपूर्ण और सार गर्भित पंक्तियां।बहुत बहुत बधाई सुनीता जी