
प्रतिभा दुबे, प्रसिद्ध लेखिका, ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
मर्यादा की मूर्ति, मेरे श्रीराम— नाम का सार,
सत्य-धर्म की राह पर, मिले प्रभु कृपा अपार।।
वन-वन भटके, फिर भी मन में न आया द्वेष-विचार,
जन-जन के हित के लिए ही त्यागा सुख-संसार।।
पिता की आज्ञा मानकर वन को गए श्री सियाराम,
राजतिलक को छोड़कर निभाया अपना धर्म-संस्कार।।
सीता-वियोग के संघर्ष में लक्ष्मण बने सहाय,
हर संकट में साथ रहे, भ्रातृ-प्रेम निभाया।।
रावण जैसे अधर्मी का अंत किया प्रभु श्रीराम,
सत्य की हुई विजय, जग बना सुंदर धाम।।
राम-नाम की भक्ति-शक्ति से मिट जाते सब पाप,
मन में राम बस जाएँ यदि, नहीं रहता कोई भय आप।।
सीख यही श्रीराम की यह जीवन बने उजास,
सत्य, प्रेम और मर्यादा से हर लें प्रभु हर त्रास।।
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जय श्री राम 🙏💐बहुत सुंदर प्रस्तुति