
डॉ. अनामिका दुबे निधि, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
मेरी ख़ामोशियों को पढ़ लो तुम,
मुझ पे थोड़ी-सी मेहरबानी कर दो।
जो रुकी है दुआ लबों पे कहीं,
उस दुआ को ज़रा रवानी कर दो।
मेरे जज़्बात यूँ ही बिखरे हैं,
इन्हें एहसास की कहानी कर दो।
मैं थकी हूँ सफ़र-ए-हिज्र से बहुत,
मेरे हिस्से की रात सुहानी कर दो।
तुम्हें मालूम भी नहीं शायद,
क्या असर है तुम्हारी बातों में।
एक नज़र भर जो ठहर जाओ तो,
मेरी सदियों की परेशानी कम कर दो।
मेरे अल्फ़ाज़ आईना हैं तुम्हारे,
इनमें चेहरा तुम्हारा बसता है।
रूह से रूह अगर छू जाए कभी,
फिर न दूरी की कोई निशानी कर दो।
‘निधि’ अब और सब्र क्या रखे,
जब मुक़द्दर सवाल करता है
एक बार तुम मुझे अपना कह दो,
मेरी दुनिया ही आसमानी कर दो।
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