
कंचनमाला अमर ‘उर्मी ” नई दिल्ली
शब वही लेकिन नजारा और है,
अब तो साहिल का किनारा और है।
हमने समझा गैर हैं वो अब तलक,
उनकी बातों में इशारा और है।
आ गए तूफानों से लड़कर तो हम,
पार करने को तो दरिया और है।
जिंदगी भरपूर देखा उम्र भर,
फिर भी उठना बाकी पर्दा और है।
आए हैं बनकर मसीहा लोग अब,
जानती हूं ये मुखौटा और है।
