
मधु चौधरी, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
बहुत देर तक रोने के बाद जब वह उठी, तो आँखों में अब आँसू नहीं, एक अजीब सी शांति थी। मुँह धोकर वह किचन में आई और चाय का पानी चढ़ाया। अपनी शादीशुदा जिंदगी में बहुत खुश थी परिवार,करियर, बच्चे और समाज में प्रतिष्ठा। इतना अच्छा जीवन साथी मिलने के बाद उसने कभी मुड़कर नहीं देखा। लेकिन अपमान की लपट से आत्मा झुलसी हुई थी। आज उसका हिसाब चुकता हो गया था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे रूह पर जमी बरसों की गर्द साफ हो गई हो।
आज सुबह तक सब कुछ सामान्य था। लेकिन मेट्रो के उस सफर ने सब बदल दिया। अचानक वह सामने खड़ा था। वही चेहरा, वही बात करने का अंदाज़, जिसने कभी उसकी पूरी दुनिया उजाड़ दी थी। कभी सोचा नहीं था कि इतने सालों बाद इस तरह अचानक वह सामने आ जाएगा।
उसने अपनी गलती मानी, पर उसे क्या लगा था? एक ‘सॉरी’ उन पुराने घावों को जादू से गायब कर देगा? उसके विश्वास पर ही तो उसने अपने घर में सबको बताया था, अपनों से बगावत की थी… और फिर वह कायर की तरह पीछे हट गया।
”मानता हूँ मेरी गलती थी,” उसने मेट्रो के शोर के बीच अपनी नजरें झुकाकर कहा, “पर मैं डर गया था। मुझमें हिम्मत नहीं थी कि घर छोड़कर तुम्हारी ज़िम्मेदारी उठा पाता। मुझे माफ कर दो… प्लीज, मुझसे नफरत मत करो।”
उसने ठंडी निगाहों से उसे देखा और बस इतना कहा, “मेरा अब तुमसे कोई रिश्ता नहीं है ,ना नफरत का, ना प्यार का। और जब रिश्ता ही नहीं, तो शिकायत कैसी?”
थैक्यु …. उसके चेहरे पर एक फीकी चमक आई, “मतलब तुमने मुझे माफ कर दिया! सुनो… मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करता हूँ। क्या हम फिर से दोस्त बन सकते हैं? सिर्फ कभी-कभी बात तो कर ही सकती हो ना?” नंबर नहीं देना चाहो तो फेसबुक पर ?
अभी तक वह अपनी नज़रें झुकाए बैठी थी, पर ‘दोस्ती’ शब्द सुनते ही जैसे उसके आत्मसम्मान को किसी ने झकझोर दिया। वह झटके से उठकर खड़ी हुई, उसकी आँखों में सीधे झाँका और एक तीखी मुस्कान के साथ कहा -“हाँ, क्यों नहीं! हम दोस्त हैं।”
वह खुश हुआ ही था कि उसने कहा “चलो फिर, मुझे अभी अपने घर ले चलो और अपनी पत्नी से मिलवाओ। पर उसे क्या कहकर मिलवाओगे? उसे बताओगे कि तुम वही हो जिसे मैं अपनी कायरता के बीच मझधार में छोड़ आया था?”
वह सकपका गया। हकलाते हुए बोला, “अरे… पत्नी से क्यों? हम पुराने दोस्तों की तरह मिलेंगे। हमारी दोस्ती से मेरी पत्नी या तुम्हारे पति का क्या लेना-देना? वह हमारे बीच की बात होगी।”
उसकी बात सुनकर उसने एक कदम आगे बढ़ाया और फुसफुसाते हुए कहा –
”तो तुम आज भी वही ‘डरपोक’ इंसान हो जो चोर दरवाजों से रिश्ता निभाना चाहता है? 27 साल पहले तुम समाज से डरे थे, आज अपनी पत्नी से डर रहे हो। तुम दोस्ती नहीं, एक ‘सुविधा’ ढूँढ रहे हो ताकि अपनी बोरियत मिटा सको। एक रिश्ता तुम ढंग से निभा नहीं सके, और अब दूसरे में भी झूठ की मिलावट चाहते हो? मैं अब तुम्हारी किसी बात में आने वाली नहीं।”
मेट्रो का दरवाजा खुला। वह बिना पीछे मुड़े कोच से बाहर निकल गई। पीछे एक ऐसा शख्स खड़ा रह गया जो आज फिर अपनी नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
चाय उबल चुकी थी। उसने कप में चाय छानी और बालकनी में आकर बैठ गई। आज 27 साल बाद वह चाय उसे कड़वी नहीं, सुकून भरी लग रही थी। उसने अपनी बेटी को कमरे से आते देखा, जिसमें उसे अपना ही निडर अक्स नज़र आता था।
उसने चाय की पहली चुस्की ली और खुद से कहा- “अब मन का कोना-कोना साफ है। कुछ उधारी थी, जो आज चुका दी।”
ये रचनाएं भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें-
घट-घट में बसे हैं राम
मैं अल्हड़-सी लड़की
श्रीराम भक्ति कविता
जीने के लिये

बहुत अच्छी कहानी 👌