
डॉ. मोनिका काकोड़िया, अलवर (राजस्थान)
एक दिन
एक कविता लिखूँगी।
इसमें लिखूँगी
केंचुए, मेंढक
और गिलहरियाँ,
खरगोश, चूहे
और बकरियाँ।
मैं नहीं करूँगी ज़िक्र
शेर, चीते
और बघेरे का,
लकड़बग्घों, लोमड़ी
और भेड़ियों का।
छिन लिया जाएगा
इनसे जंगल राज,
अब सत्ता सौंपी जाएगी
हिरण, मोर
और हाथियों को।
बदलाव से बदलेंगी
सभ्यताएँ,
प्रजातंत्र
बदलाव की जुगत में रहता है।
हिरण ने देखा
दुःख पुरखों का,
मोर की नज़र से
कुछ बचा नहीं।
भय को जिया गया
कितना, कितना, कब-कब।
हाथियों का हौसला
काम आएगा,
इस तरह प्रजातंत्र
बचाया जाएगा।
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