कसक

मासूम मुस्कान और गहरे रहस्यमयी नयनों वाली साधारण भारतीय युवती बिना श्रृंगार भी जो दिल को छू जाए, वही असली सुंदरता है…"

सवितासिंह “मीरा”, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

गूढ़ लगे वह इतनी,
जैसे कोई हो वेद।
कैसे समझ सके मन,
उसके नयन के भेद।

बिखरी-बिखरी लट पर,
ना चाहे श्रृंगार।
मासूम सी मुस्कान,
छू ले हृदय का तार।

नयन उठें तो जैसे,
रुक जाए हर आकाश।
लगती वही तो जैसे,
धर्मवीर की अभिलाष।

हर रूप में छुपी सी,
झलकती कोई सुधा।
हर मौन में बसा-सा,
लगता कोई चंदर।

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