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महाभारत की सभा में खड़ी द्रौपदी, पांडवों और भीष्म के सामने प्रश्न उठाती हुई

पुरुषार्थ

महाभारत के द्यूत क्रीड़ा प्रसंग के बाद का एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक चित्रण है, जहाँ द्रौपदी पांडवों और भीष्म पितामह के सामने अपने अपमान और न्याय के प्रश्न उठाती हैं। यह रचना न केवल पौराणिक घटना को जीवंत करती है, बल्कि आज के समाज में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता को भी उजागर करती है। जानिए सच्चे पुरुषार्थ का अर्थ क्या है।

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“प्रजातंत्र का प्रतीक वन दृश्य”

एक कविता लिखूँगी…

यह कविता जंगल के रूपक के माध्यम से प्रजातंत्र और सत्ता परिवर्तन की गहरी सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करती है। इसमें हिंसक और शक्तिशाली जीवों के स्थान पर शांतिप्रिय और संवेदनशील जीवों को सत्ता सौंपने की कल्पना की गई है। यह केवल एक काल्पनिक बदलाव नहीं, बल्कि समाज में न्याय, समानता और संतुलन की आवश्यकता को दर्शाता है। कविता यह संदेश देती है कि जब भय और शोषण पर आधारित व्यवस्था समाप्त होती है, तब ही वास्तविक प्रजातंत्र स्थापित हो सकता है।

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होशियार मां

सरला को यक़ीन था कि उसकी बहू उसकी सहेली बनेगी। पर शादी के बाद कहानी कुछ और ही निकली। रिश्ते की शुरुआत से ही अमीषा के नख़रे और लालच से अमित टूटने लगा। जब उसने पैसों और ज़मीन की माँग की तो सरला को समझ आ गया — बात सिर्फ़ ईगो या गलतफ़हमी की नहीं, लोभ की थी। बेटे को बचाने के लिए उसने शांति से, लेकिन चतुराई से उस सच को रिकॉर्ड कर लिया — जिस पर अमीषा को हमेशा भरोसा था कि कोई पकड़ नहीं पाएगा।कोर्ट में सच्चाई का वीडियो जैसे ही सामने आया सबकी स्थिति पलट गई।

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किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

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ये कैसी भोर..

यह कैसी भोर है जहाँ सूरज की तपिश बढ़ रही है लेकिन शीतलता कहीं नहीं है। फूल खिले हैं पर उनमें महक नहीं, हवा बह रही है लेकिन उसमें सुकून नहीं। चारों ओर आपदाएँ बढ़ रही हैं और कवि का मन व्यथित है। उत्तराखंड की तबाही में असंख्य लोग अपने प्रियजनों को खो चुके हैं।

समय अभी भी है—हमें सँभलना होगा। हिमालय के साथ प्रयोग और परमाणु अत्याचार रोकना होगा, वरना यह विनाशकारी रास्ता भयानक परिणाम देगा। प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर ज्वालामुखी फूटेंगे, भूकंप और सुनामी आएँगे और जीवन झुलस जाएगा। प्रकृति किसी की संपत्ति नहीं है, इस पर राजनीति करना आत्मघाती है। जब कुदरत का न्याय चलता है तब किसी की वकालत काम नहीं आती। मनुष्य को अपने स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलन बनाना ही होगा, नहीं तो भोर भी अँधियारी लगने लगेगी।

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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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