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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखो
यह बनफूल फिर से महक उठा।

पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,
विषधर की कल्पना से मैं जी उठा।

रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,
आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा।

अधर्म की जब-जब हो विजय,
कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा।

क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,
जरा संभल तू, जोखिम उठा।

नाप ले डगर बलिवेदी की तू,
हुंकार भर अज्ञानी, सर उठा।

स्वार्थ साधे बन गए विलासी,
रख मूल्य ऊँचे जा, गीता उठा।

डॉ. मीना मुक्ति, प्रसिद्ध लेखिका, लातूर

4 thoughts on “गीता उठा

  1. मीना जी ,
    बहुत अर्थपूर्ण लिखा आपने ।

    अधर्म की जब-जब हो विजय,
    कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा।

    बहुत-बहुत बधाई

    1. हार्दिक धन्यवाद विनीता जी आप की सराहना ने मेरा मनोबल बढा दिया है 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

    1. बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति मीनू जी 👏

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