हे मेरे पितर!
आपको सादर नमन।
मैं नहीं जानती
मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ क्या होता है, आत्मा किस लोक में जाती है। लोग पितरों के नाम पर दान-पुण्य, भोजन-भात, अनेकों वस्त्र, आभूषण, गाय, जमीन, अपने आय का बड़ा हिस्सा दान करते हैं।
मैं नहीं जानती
जीवन से अधिक मृत्यु का महत्व क्यों है, किन्तु एक बात निश्चित है—जीवन रहते हुए जो सेवा, जो स्नेह, जो समर्पण मैंने आपको दिया, वही मेरा वास्तविक तर्पण है।
मैं नहीं जानती
आराधना क्या है, लेकिन मन-कर्म-वचन से आपको ठेस नहीं पहुँचाया, यही मेरी सच्ची पूजा, अर्चना एवं आराधना थी।
मैं नहीं जानती
जल-तर्पण क्या है, लेकिन जब-जब आपको प्यास लगी और मैंने अपने इन हाथों से आपको जल पिलाया—वही मेरा जल-तर्पण था।
मैं नहीं जानती
श्रद्धा क्या है, लेकिन जब भी आपके उदास चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास किया—वही मेरी सच्ची श्रद्धा थी।
मैं नहीं जानती
समर्पण क्या है, लेकिन जब-जब आपकी छोटी-सी भी इच्छाओं को पूरा करने का अवसर मिला—वही मेरा समर्पण था।
मैं नहीं जानती पूजा क्या है, लेकिन जब आपके दुःख के क्षणों में आपको सहारा दिया, आपके भारी मन को हल्का करने का प्रयत्न किया—वहीं मेरी पूजा थी।
मैं नहीं जानती
सेवा क्या है, लेकिन जब अपने हाथों से आपको भोजन परोसा, उसी में मेरी सेवा का सम्पूर्ण अर्थ छिपा था।
हे पितर!
आज आप साकार रूप में मेरे साथ नहीं हैं, फिर भी आपकी स्मृति मेरे सांस में बसी है।
मैं नहीं जानती श्रद्धांजलि क्या है और धर्म क्या है, लेकिन मैंने जीते-जी जो कुछ भी आपके लिए किया, वही मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है और वही मेरे जीवन का सबसे पवित्र धर्म है।
श्रद्धांजलि सहित

सुप्रसन्ना, प्रसिद्ध लेखिका, जोधपुर

बिल्कुल सही और सटीक चिंतन
Very nice
सटीक व सारगर्भित चिंतन
बिल्कुल सही कहा आपने 👌👌
सही सोच, और वैसी ही लेखनी
बहुत ही सुंदर 👌
प्रिय सुप्रसन्ना जी
बड़ों – बूढ़ों , बच्चों की देखभाल का कोई जवाब नहीं ।
इतनी सच्ची और अर्थपूर्ण श्रद्धांजलि के लिए
बहुत-बहुत बधाई।