कालरात्रि माँ
“गर्दभ वाहन पर विराजित, खड्ग-खप्परधारी कालरात्रि माँ, शत्रु का दमन करने वाली और भक्तों को समृद्धि देने वाली माता। सप्तम दिन पूजा करने से दूर होती हैं बाधाएँ, और अर्पित रक्त पुष्प व शहद से होती है शुभ फलप्राप्ति।”

“गर्दभ वाहन पर विराजित, खड्ग-खप्परधारी कालरात्रि माँ, शत्रु का दमन करने वाली और भक्तों को समृद्धि देने वाली माता। सप्तम दिन पूजा करने से दूर होती हैं बाधाएँ, और अर्पित रक्त पुष्प व शहद से होती है शुभ फलप्राप्ति।”
पूजा पंडाल में ढोल की थाप गूँज रही थी। विसर्जन से ठीक पहले का दिन! लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी में सजी महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर, एक-दूसरे की माँग और गालों पर रंग भर रही थीं।
भीड़ के बीच खड़ी रितुपर्णा बाहर से मुस्करा रही थी, मगर भीतर खालीपन था। कुछ महीने पहले पति ने शराब के नशे में घर से निकाल दिया था। अकेली रहती तो ठीक था, पर बच्चे की परवरिश? सोचकर दिल डूब जाता।
तभी उसकी नज़र पंडाल के कोने में गई—एक आदमी अपनी पत्नी पर चिल्ला रहा था। अगले ही पल गाल पर जोरदार थप्पड़! भीड़ ने देखा, पर सब चुप। औरत आँचल मसलती, आँखें झुकाए आँसू पोंछ रही थी।
नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल देवी की मूर्तियों की आराधना तक सीमित नहीं हैं। यदि समाज में नारी असुरक्षित है, तो देवी पूजन का वास्तविक भाव अधूरा रह जाता है। नारी सिर्फ पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता मिलती है, तभी देवी की शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक सजीव होता है। भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है, और वही शक्ति घर और समाज की आधारशिला है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर हर घर, गली और कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित और स्वतंत्र बनाना ही सच्ची भक्ति है। नवरात्रि हमें यही प्रेरणा देती है कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना है।
पितरों के प्रति सच्चे प्रेम, समर्पण और सेवा की भावनाओं को दर्शाता है। लेखक बताती हैं कि मृत्यु के बाद क्या होता है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जीवन में जो स्नेह, सेवा और प्रेम उन्होंने अपने पितरों को दिया, वही उनकी वास्तविक श्रद्धांजलि और पूजा है। जल-तर्पण, श्रद्धा, समर्पण और सेवा जैसी परंपराओं का सार वही है जो जीवन में किए गए कर्मों में प्रकट होता है। यह पाठ याद दिलाता है कि सच्चा धर्म और श्रद्धा भौतिक दान या रस्मों में नहीं, बल्कि अपने हृदय, कर्म और प्रेम में निहित होता है।