महफ़िल अदब की

हर उड़ान को एक डोर चाहिए — जैसे हर रिश्ते को भरोसा।
बिना उस जोड़ के, कोई पतंग ऊँचाइयों तक नहीं पहुँचती, जैसे बिना बरसात के कोई मोर नहीं नाचता।
मेरे लिए मंज़िल वही है जहाँ तुम हो; और जो राह तुम्हारी ओर न जाती हो, उसे चुनने का कोई अर्थ नहीं।
दिल पर ज़ोर चलाने की बातें बस किताबों में अच्छी लगती हैं — हक़ीक़त में तो हर इंसान अपनी दबाई हुई ख़्वाहिशों का कैदी है।
यह महफ़िल अदब की है, यहाँ शब्दों से शोर नहीं, रोशनी फैलानी होती है — सुख़न की शम्मअ जलानी होती है। कभी नज़रों से, कभी दिल से लोग चुराते रहते हैं —

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ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

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सागर

सागर की बलखाती लहरें मानो किसी प्रियजन को पुकार रही हों। हर उठती-गिरती मौज एक गीत है—कोमल, मधुर और रहस्यमय। कभी लगता है कि ये लहरें चाँद से धीमे-धीमे बातें कर रही हैं, अपने भीतर छिपे राज़ को साझा कर रही हैं। हवा भी इसमें शामिल हो जाती है, गुनगुनाहट में एक नई धुन जोड़ देती है।

रात का आकाश सितारों से झिलमिलाता है, और सागर उस रोशनी को अपने सीने में समेटकर जैसे सुबह की प्रतीक्षा करता है। सुबह का आकर्षण उसे दीवाना बना देता है—हर लहर में एक झनक, जैसे झाँझर की मधुर ध्वनि।इन लहरों में न जाने कितनी कहानियाँ बसी हैं। कुछ रंगीन सपनों की, कुछ भोली नादानियों की। मन चाहता है कि इन पलों को पलकों में बाँध लूँ, जगमगाते मोतियों की तरह सँभालकर रख लूँ।

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इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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आ अब लौट चलें

अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।

हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।

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ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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मैं नहीं जानती..

पितरों के प्रति सच्चे प्रेम, समर्पण और सेवा की भावनाओं को दर्शाता है। लेखक बताती हैं कि मृत्यु के बाद क्या होता है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जीवन में जो स्नेह, सेवा और प्रेम उन्होंने अपने पितरों को दिया, वही उनकी वास्तविक श्रद्धांजलि और पूजा है। जल-तर्पण, श्रद्धा, समर्पण और सेवा जैसी परंपराओं का सार वही है जो जीवन में किए गए कर्मों में प्रकट होता है। यह पाठ याद दिलाता है कि सच्चा धर्म और श्रद्धा भौतिक दान या रस्मों में नहीं, बल्कि अपने हृदय, कर्म और प्रेम में निहित होता है।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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मौन..

जब मन, शरीर और आत्मा एकसमान और संतुलित स्थिति में होते हैं, तब वास्तविक मौन का अनुभव होता है। ध्यान और मौन के अभ्यास से हम न केवल अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि ब्रह्मांड की शक्तियों और जीवन के गहरे रहस्यों से भी परिचित हो सकते हैं। नकारात्मक विचारों की तरह मन की उर्जा भी बिखरती रहती है, जिससे निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। इसे शांत और सकारात्मक विचारों से भरकर, हम अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ा सकते हैं और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यह अभ्यास निरंतरता और धैर्य मांगता है, पर धीरे-धीरे यह सुखद अनुभव और गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों का मार्ग खोलता है।

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 युगान्तर

उस दौर में जीवन के उपन्यास पर हस्ताक्षर करना इतना आसान नहीं था, जैसे आज है। मानो जैसे अंगारों पर चलना हो। फिर भी उसे सच बताना पड़ा और मुझे सच छुपाना पड़ा। वह एक संपूर्ण प्रेम-ग्रंथ था और मैं पाँच कोस की बदलती बोली। जीवन के कोरे कागज़ पर उसने मनमर्ज़ियाँ लिखीं और मैंने बंदिशें। कागज़ और स्याही किसी के पास नहीं थे, बस अनाम सी एक उड़ान थी। यक़ीन के साहिल पर वह ठहरा रहा और मैं वक़्त की नज़ाकत में बहती चली गई। उसने चक्रव्यूह की सलाखें तोड़ दीं, जबकि मैं सही और ग़लत के भँवर में उलझती रही। उसके लिए फ़ासले और फ़ैसले कम थे, मगर मेरे लिए वही बहुत भारी थे—कभी वक़्त के और कभी दहलीज़ के।

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