आ अब लौट चलें

रेणुका अस्थाना, भिवाड़ी (राजस्थान)

चलो अब लौट चलते हैं
है हर पल अब बहुत भारी
बहुत गहरी सी चुप्पी है
हंसी में बंध गयी आरी ।

हर हंसते शब्द हैं बोझिल
औ रिश्ते हो रहे धुंधले
उजाला घट रहा देखो
समय की कैसी दुश्वारी ?

तुम्हारी थाम कर उँगली
समय के पार जाना था
बस एक तिनके के टुकड़े सा
तुम्हारा साथ पाना था

न आया था कोई मँझधार
ना तूफ़ान आया था
न ही डोंगी कोई डूबी
न मौसम लड़खड़ाया था

न जाने क्यों समय ने तोड़ दी
शब्दों की तुरपाई
न जाने क्यों वो अपनापन
हुआ पत्थर से अब भारी

चलो अब लौट चलते हैं
हम अपनी ही दिशाओं में
तुम जीतो हर समय अपना
करूँ मैं अपनी तैयारी .

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