कुर्बानी

आँवले के उस पुराने पेड़ के नीचे जहाँ कभी उनका प्यार अंकुरित हुआ था, आज सीमा और अर्जुन फिर चुपचाप बैठे थे। वक्त बहुत बदल चुका था, पर भावनाएँ नहीं। सीमा का दिल अर्जुन के बिना किसी और को स्वीकार नहीं कर पा रहा था, जबकि अर्जुन अपनी भावनाओं को दबाकर उसे उसके माता-पिता के सपनों को पूरा करने की राह दिखा रहा था।
उसकी आँखों में छिपा दर्द साफ़ था. अपने प्यार को खोने का नहीं, बल्कि सीमा की खुशियाँ बचाने का। किसी और की भलाई के लिए दिल को चीर देना वही उसकी सबसे बड़ी कुर्बानी थी।

Read More

दूरी के साये

आजकल विदेश में बसे बच्चों के माता-पिता का अंतिम जीवन कुछ ऐसा ही होता है. कई माता-पिता का पार्थिव शरीर फ्रीज़र में दिनों तक रखा रहता है, बच्चों के आने का इंतज़ार करता हुआ। कई बुज़ुर्ग अपने फ्लैट में अकेले मर जाते हैं. 3–4 दिन बाद बदबू आने पर पड़ोसियों को पता चलता है, फिर बच्चों को खबर दी जाती है।

Read More

किराए की खुशियाँ

कभी-कभी हम ऐसी खुशियों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो हमारी ज़िंदगी में किराए की तरह आती हैं. कुछ समय रुकती हैं और फिर चली जाती हैं। हम जानते हैं कि वे स्थायी नहीं हैं, फिर भी दिल उन्हें पाने की उम्मीद करता रहता है। इस रिश्ते में भी यही हुआ। ख़ामोशी हमारी भाषा थी, नज़रें संवाद थीं, और उम्मीद हमारा सहारा। हमने अपनी ओर से सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन साथ नहीं मिला। अब वही इंसान, जिसके साथ एक घर बसाने का सपना था, हर बात पर तकरार करता है, और बेरुख़ी को स्वीकार करता है जैसे ये उसकी नई आदत हो।

Read More

एक विरह ऐसा भी…

वियोग के उस क्षण में कवि को उसकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता दोनों दिखाई देते हैं। बिछड़ते समय दोनों ने कुछ न कुछ खोया था. एक ने उदासी को सहा, दूसरे ने निश्चय को अपने होंठों पर थामे रखा। इस टूटते हुए रिश्ते के बीच भी कवि के भीतर एक मौन विश्वास जन्म लेता है कि प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

Read More

प्रेम का एहसास

प्रेम का पहला धुँधलका मैंने उसकी आँखों में देखा था वहाँ कोई असहज चाह नहीं, बल्कि एक ऐसी कोमलता थी जिसमें मेरा अस्तित्व अनायास घुलने लगता था। उस क्षण में प्रेम और देह, दोनों किसी पवित्र स्वीकृति की तरह एक-दूसरे में समा रहे थे।
मैंने महसूस किया था कि कुछ खोने की प्रक्रिया हम दोनों के भीतर एक साथ चल रही है अपने-अपने विश्वास, अपनी सुरक्षा, अपनी आदतें… मानो प्रेम हमें भीतर से उधेड़कर, नए रूप में बुन रहा हो।

Read More

ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

Read More

आ अब लौट चलें

अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।

हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।

Read More

आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

Read More