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किराए की खुशियाँ

डॉ. रश्मि मुंबई, प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखिका

किराए की खुशियों का इंतज़ार करते हैं,
बस यही कसूर बार-बार करते हैं।
यूँ तो कहीं भी मिलता नहीं उसका निशाँ,
पर वो कहीं तो है ऐतबार करते हैं।

एक चीज़ थी ख़ामोशी, जो आँखों से बयाँ होती है,
कोई सुनने तो आए, हम कब इनकार करते हैं।
सब कुछ लगाकर दाँव पर अपना मैंने,
ना फिर भी साथ उनका पाया,
अब वो ही बात-बात पर तकरार करते हैं।

सोचा था उनके घर की शोभा बनूँगी एक दिन,
पर ज़िंदगी को वही शर्मसार करते हैं।
बस यही कसूर बार-बार करते हैं।

खुशियों से बेदख़ल कर दिया, घर निकाला हमको,
पल-पल वो बेरुख़ी का इकरार करते हैं।
बस यही कसूर बार-बार करते हैं।

वो भी बड़े ग़ज़ब हैं, हम भी तो निराले हैं,
उनके दिल पर हम भी इख़्तियार रखते हैं
बस यही कसूर बार-बार करते हैं।

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