घर की देहरी पर अकेले बैठे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति, जो भावनात्मक अकेलेपन और सहारे की तलाश को दर्शाता है

बुज़ुर्गों की चुप्पी

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में, जहाँ हर कोई अपनी व्यस्तताओं में उलझा है, वहीं घर के बुज़ुर्ग धीरे-धीरे अकेले होते जा रहे हैं। जिन लोगों ने कभी हमें संभाला, वही आज अपने ही घर में सहारे और संवाद की तलाश करते दिखाई देते हैं। समस्या बुज़ुर्गों में नहीं, बल्कि बदलती हमारी संवेदनाओं में है। हमें यह समझना होगा कि उन्हें दया नहीं, बल्कि अपनापन, सम्मान और साथ चाहिए—क्योंकि आज वे जिस जगह हैं, कल हम भी वहीं होंगे।

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बदलता वक़्त

कभी अल्हड़ और शरारती रहे हम, अब समझदार होकर चुप्पी में जीना सीख गए हैं। मौसम, बारिश और दोस्तों संग बिताए हंगामे पीछे छूट गए। अब खुशियाँ भी मन में ही दबाकर रख लेते हैं। ज़िंदगी की राह पर निकले तो थे कहीं और, पर दिशा बदल गई और हम धीरे-धीरे बदलते गए।

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दूरी के साये

आजकल विदेश में बसे बच्चों के माता-पिता का अंतिम जीवन कुछ ऐसा ही होता है. कई माता-पिता का पार्थिव शरीर फ्रीज़र में दिनों तक रखा रहता है, बच्चों के आने का इंतज़ार करता हुआ। कई बुज़ुर्ग अपने फ्लैट में अकेले मर जाते हैं. 3–4 दिन बाद बदबू आने पर पड़ोसियों को पता चलता है, फिर बच्चों को खबर दी जाती है।

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किराए की खुशियाँ

कभी-कभी हम ऐसी खुशियों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो हमारी ज़िंदगी में किराए की तरह आती हैं. कुछ समय रुकती हैं और फिर चली जाती हैं। हम जानते हैं कि वे स्थायी नहीं हैं, फिर भी दिल उन्हें पाने की उम्मीद करता रहता है। इस रिश्ते में भी यही हुआ। ख़ामोशी हमारी भाषा थी, नज़रें संवाद थीं, और उम्मीद हमारा सहारा। हमने अपनी ओर से सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन साथ नहीं मिला। अब वही इंसान, जिसके साथ एक घर बसाने का सपना था, हर बात पर तकरार करता है, और बेरुख़ी को स्वीकार करता है जैसे ये उसकी नई आदत हो।

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दास्तान ए जिंदगी

दास्तान-ए-ज़िंदगी” उस कहानी को बयां करती है जो काग़ज़ पर नहीं, आँखों की नमी में लिखी जाती है। जज़्बात कभी शब्द बनकर नहीं उतरते—वे खून की जुबान में अपनी दास्तान सुनाते हैं। चाँद को दिल में सँभाल कर रखने की मासूम हिदायत है, क्योंकि उसकी चाँदनी भी शरमाती है। रात की वीरानी, सूने सपने और ख़ामोश गलियाँ एक अकेलेपन का नक्श बनाती हैं। फिर भी किसी की मुस्कुराहट दिल की धड़कनों में रवानी भर देती है।

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शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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” बाऊजी “

बाऊजी को रिटायर हुए पंद्रह साल बीत चुके थे। माँ के जाने के बाद उनकी दुनिया जैसे सूनी पड़ गई थी, इसलिए मैं उन्हें दिल्ली से मुंबई अपने पास ले आया। हर संभव सुविधा देने की कोशिश करता रहा दवाइयाँ, ताज़ा फल, सुख-सुविधाएँ पर बाऊजी का मन हमेशा उसी पुराने घर में अटका रहता जहाँ माँ की यादें थीं। एक सुबह दूध की एक गिलास ने सब कुछ उजागर कर दिया. दूध में पानी, और मेरे हिस्से में शुद्ध दूध। पापा के सामने मेरा सिर झुक गया। उन्होंने बात को हँसकर टाल दिया, पर उनके स्वर की कंपकंपाहट मेरे मन पर चुभ गई।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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अहसास का रिश्ता

बुढ़ापे में अकेलेपन से लड़ते-लड़ते थक चुके थे दोनों। बच्चे अपनी दुनिया में चले गए थे। सुबह की वॉक में बस हल्की सी “नमस्ते” होती थी. लेकिन उसी छोटी-सी मुस्कान ने भीतर कहीं एक गहरी पहचान बना दी थी। फिर धीरे-धीरे चाय, ग़ज़लें, खाना, बीमार पड़ने पर ख़याल… और एक दिन एहसास हुआ. हम तो एक-दूसरे के सहारे फिर से जीना सीख गए हैं।प्यार कभी उम्र नहीं देखता।
कभी देर से ही सही . पर सच्चा साथ मिल जाता है।

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मकाँ

एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।

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