रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
रात को सोने से पहले अब बस एक ही आदत रह गई है.
स्क्रीन पर निगाह टिकाए रखना।
न कोई ख़ास बात करनी होती है,
न कोई शिकायत,
बस इंतज़ार…
कि वो कब ऑनलाइन आएगी।
कभी आधा घंटा, कभी एक घंटा बीत जाता है,
पर उस ऑनलाइन की हरी बत्ती नज़र नहीं आती।
तब लगता है, जैसे रात ठहर सी गई हो,
घड़ी की सुइयाँ भी उसकी यादों में अटक गई हों।
हर रोज़ का वही सिलसिला-
“अरे, आज तुम्हारी सुबह नहीं हुई अभी तक?”
बस यही एक लाइन…
गुड मॉर्निंग कहने का मेरा तरीका है।
और उधर से जवाब आता है,
“फोन पर तो अभी ही सुबह हुई है मेरी… गुड मॉर्निंग बोलो।”
और मैं मुस्कुरा देता हूँ,
जैसे उसकी मुस्कान ने मेरे कमरे की ख़ामोशी भर दी हो।
थोड़ी देर की बातें चलती हैं…
“क्या कर रही हो?”
“कुछ नहीं, बस फैमिली के साथ थी कल।”
“अच्छा, और अब?”
“अब बस काम चल रहा है…”
फिर मैं जल्दी से कोई नया बहाना ढूँढता हूँ.
“देखो, आज नया जैकेट लिया है, कैसा है?”
“वाह, बहुत अच्छा है… रंग भी खूब है!”
“और ये देखो, मेरा दोस्त घूमने गया था, मेरे लिए ये लाया!”
“ओह… सच में बहुत अच्छे दोस्त हैं तुम्हारे।”
बस, ऐसे ही छोटी-छोटी बातों में मैं उसे बांधने की कोशिश करता हूँ—
कभी अपनी कहानियों से,
कभी अपनी म्यूज़िक लाइब्रेरी से,
कभी अपने किचन के प्यालों की तस्वीरों से,
कभी अपने लिविंग रूम के लैंप की रोशनी में…
वो दीवाली की रोशनी जैसी है—
थोड़ी देर के लिए जगमगा जाती है,
फिर गुम हो जाती है अंधेरे में।
और मैं?
मैं फिर उसी रोशनी का इंतज़ार करता हूँ,
कि वो फिर आए,
कुछ सुने, कुछ सुनाए,
और ये बातें…
थोड़ी और देर तक चल सकें,
जैसे उसके नाम से शुरू होकर
मेरे दिल की धड़कनों में खो जाएं।

वाह!
आजकल हरी बत्ती का एक मनपसन्द
उपयोग आपकी कविता को सार्वभौमिक और सच्चा बना देता है ।
कैसे कहें क्या ग़लत क्या सही है ।
जीवन है गम्भीर कहानी तो हंसी , मज़ाक के किस्से भी अमर जरूरतें बनते जा रहे हैं।
“वो दीवाली की रोशनी जैसी है—
थोड़ी देर के लिए जगमगा जाती है,
फिर गुम हो जाती है अंधेरे में।”
बहुत सुंदर वर्णन।
सटीक हर्फ है एक एक
वाह बेहतरीन सृजन
Bahot accha likha hai