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टूटना एक डाल का…

राकेश चंद्रा, लखनऊ

टूटना एक डाल का…

आंधियों से टूट गई वह शाख
जो आम से लदी थी,
छोड़ गई पत्तियों के झुरमुट को
पेड़ पर टंगे हुए।

जीवन की आंधियों में अक्सर
ही टूट जाते हैं शख्स
अपने सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से;
लहलहाते हैं रक्तबीज
दुनियावी दंगल में।

बिखर गए हैं परिंदों के घोसले
हवाओं के जोर से;
कोयल जो गा रही थी मधुर तान में,
है खो गई अचानक
नए ठौर की तलाश में।

स्वप्नजीवी गा रहे हैं
नई रोशनी के गीत।

4 thoughts on “टूटना एक डाल का…

  1. बहुत अर्थपूर्ण लिखा है
    प्रकृतिवश असमय विध्वंस वापस नहीं ला सकता
    जो जड़ से ख़त्म हुआ , फिर भी आशा नहीं मरती “स्वप्नजीवी गा रहे हैं
    नई रोशनी के गीत।”
    नई रचना का स्वागत ही एक उपाय है ।

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