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टूटना एक डाल का…

जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।

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आइना पूछता है…

आइना अब मुझसे पूछता है कि मैं कौन हूँ, किसकी तस्वीर हूँ। मेरा चेहरा तो सामने है, लेकिन मेरी परछाईं में किसी और की तासीर बसती है। पलकों पर ठहरे मौसम और होठों पर आधी मुस्कान—यह सब उसने छोड़ा था, शायद किसी अनकहे ग़म की पहचान के तौर पर। हर दिन सवेरा आता है, लेकिन उजियारा अधूरा-सा लगता है। रास्ते वही हैं, कदम वही हैं, पर मन अब पूरा नहीं लगता। मेरे भीतर यादों का एक घर है, जहाँ खामोशियाँ अपनी भाषा में बोलती हैं। जब मैं आइने में खुद को देखता हूँ, तो लगता है कि वह अब भी मुझमें कहीं डोलती हैं। शायद इसी वजह से आइना एक दिन डर गया—कैसे दिखाए वो सूरत, जो अब किसी और के असर में जी रही है।

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