संवेदना
मानवता..
यह कविता मानवता को एक जीवंत स्वर में प्रस्तुत करती है—जो कभी समाज की आत्मा थी, आज उपेक्षा और कठोरता के बीच संघर्ष कर रही है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता को अपने कर्म, साहस और संवेदना से जीवित रखे हुए हैं। यह रचना पाठक को याद दिलाती है कि मानवता के बिना संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
अभिव्यंजना…
यह कविता शब्दों की मर्यादा, मनकही अभिव्यक्तियों और स्मृतियों के माध्यम से प्रेम, प्रतीक्षा और चेतना के भावों को कोमलता से रचती है।
क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ
यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?
लिखते हुए तुम
यह कविता लिखने की प्रक्रिया के भीतर छिपे प्रेम, एकाग्रता और भावनात्मक जुड़ाव को उकेरती है। प्रिय को लिखते हुए देखना, उसकी उँगलियों, कलम और भावनाओं को महसूस करना यह रचना शब्दों से पहले जन्म लेने वाले एहसासों की कथा है।
तुम सपने ज़रूर देखना…
यह कविता सपनों के माध्यम से माँ और संतान के रिश्ते की उस गहराई को छूती है, जहाँ प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि त्याग बन जाता है. महानगर की चकाचौंध के बीच यह रचना याद दिलाती है कि असली ऊर्जा माँ की आँखों में छुपी होती है, और सपनों का सच होना तभी सार्थक है जब उसमें उसकी साँसें बाकी रहें.
स्पर्श : संवेदना का संगीत
कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।
आधा केक, पूरी खुशी
यह कहानी एक बच्चे के मन में छिपे लालच से शुरू होकर संवेदना और बाँटने की सीख तक पहुँचती है। सड़क किनारे मजदूर बच्चों को बिस्किट बाँटते देख उसका मन बदल जाता है और वह समझ पाता है कि खुशी जमा करने में नहीं, बाँटने में है।
सोच बदल गई
कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.
