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मौन था वह

खिड़की के पास खड़ा एक भावुक व्यक्ति, मौन और भीतर के दर्द को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य।

डॉ. किरण सरावगी

सिसकियों और हिचकियों से रूँधा हुआ गला था,
अश्रु-जल का कोई नामोनिशान न था।
दर्द, पीड़ा और चुभन का—
सच कहूँ, कोई काम न था।

फिर भला कैसे करूँ कुछ,
दो घूँट पानी पी गया था।

दिख रहा नहीं था,
संताप से पर भरा था।
भीतर तल में ठहरा हुआ,
कंपित, द्रवित स्वर कुछ कह रहा था।

सुन नहीं पा रहा था कोई,
जो सामने खड़ा था
वो क्या कह रहा था।

क्षीण हो गई शब्द-शैली,
चक्षु-श्रवा
गर हो तो
समझ लेना था।

हर समय यही बात
तैरती है,
पत्थरों में लिख दिया हो
जैसे राम।

फिर मौन
फुफकारता,
तुम्हारी जिह्वा से
विषधर की तरह
सरक जाता है।

केचुली की तरह
शब्द होठों से लटक रहा था।

मैं जो बोल रहा होता हूँ,
तुम तक पहुँच पाना
संभव नहीं।

क़यास
शेष।
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