
रेणु परसरामपुरिया, मुंबई
कल रात बिटिया ने सुप्रीम कोर्ट के जज की भाँति अपना फैसला सुना दिया- “मुझे शादी नहीं करनी है। मुझे ट्वीशा, दीपिका या फिर पलक नहीं बनना है।”इस फैसले की आहट तो मुझे पहले से थी। माँ हूँ ना।
हालिया घटनाक्रम ने उसके अंतर्मन के द्वंद्व को समाप्त कर निर्णय लेना शायद आसान कर दिया।एक सुलझी हुई, आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान से परिपूर्ण और हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखने वाली बेटी के इस फैसले पर मुझे कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ।
शायद उसके निर्णय पर हमारी मूक सहमति ही थी, इसलिए मैं और पवन कुछ बोल ही नहीं पाए।तीस साल पहले, शादी के छह महीने बीतते-बीतते मुझे भी आत्महत्या के ख्याल आने लगे थे। समझ नहीं पा रही हूँ.
मैं इतनी कमजोर थी कि आत्महत्या नहीं कर पाई, या फिर इतनी हिम्मतवाली कि परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया। खैर, संतुष्टि सिर्फ इतनी है कि पवन एक पति के रूप में अपनी पत्नी को सम्मान दिला पाने में भले असफल रहे हों, लेकिन पिता के रूप में बेटी की भावनाएँ समझने में उन्होंने कोई गलती नहीं की।
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धन्यवाद सर