नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद

नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद

नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद सिर्फ़ आसमान का चाँद नहीं, बल्कि समय का मौन साक्षी है। जून की तपती रात में चारपाई पर लेटी एक स्त्री अपनी स्मृतियों, रिश्तों और बदलती पीढ़ियों की यात्रा को चाँद से साझा करती है। यह रचना जीवन के बदलते पड़ावों की मार्मिक अनुभूति कराती है।

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दहेज के बोझ से चिंतित बेटी और माता-पिता का भावुक दृश्य

दहेज प्रथा: विवाह संस्कार या सामाजिक व्यापार ?

दहेज प्रथा पर आधारित यह विचारोत्तेजक लेख विवाह जैसे पवित्र संस्कार के बदलते स्वरूप, सामाजिक मानसिकता, आर्थिक दबाव, स्त्रीधन के अधिकार और आधुनिक समाज की वास्तविकताओं पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है। यह लेख पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

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अलमारी में टंगे रंग-बिरंगे लेहंगे को देखती एक भारतीय महिला, शादी और पारिवारिक यादों में खोई हुई, भावनात्मक और यथार्थवादी दृश्य।

रिश्ते

खुश्बू गोयल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) वो लेहंगा, जो भैया की शादी में लिया था,उसकी भी बड़ी अजीब कहानी है। जब भी अलमारी खोलूँ,माँ को बस वही नज़र आता है,और हर बार की तरहउनका कहना शुरू हो जाता है “इतना भारी लेहंगा क्यों लिया था,जब तुझे पहनना ही नहीं था?” बस एक बार भैया की शादी…

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नए घर में अकेली बैठी एक भारतीय नवविवाहिता, चेहरे पर चिंता और भावनात्मक संघर्ष का भाव, घरेलू परिवेश की पृष्ठभूमि।

बहू भी इंसान है

शादी केवल नए रिश्तों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक स्त्री के लिए नए संघर्षों की भी शुरुआत हो सकती है। यह लेख बहू के भावनात्मक संघर्ष, अपेक्षाओं और ससुराल व्यवस्था पर जरूरी सवाल उठाता है।

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शादी न करने का फैसला सुनाती आत्मनिर्भर बेटी और उसे सुनते माता-पिता का भावनात्मक दृश्य।

फैसला

यह कहानी एक माँ की नज़र से उस पल को दर्ज करती है, जब उसकी आत्मनिर्भर बेटी शादी से इंकार कर अपनी राह चुनने का फैसला सुनाती है। इसमें रिश्तों, स्त्री-अस्मिता और पीढ़ियों के अनुभवों का गहरा भावनात्मक चित्रण है।

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घूंघट में बैठी उदास नवविवाहित महिला, भावनात्मक और यथार्थपरक दृश्य

यह भी ज़िन्दगी है

“यह भी ज़िन्दगी है” एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जो कम उम्र में विवाह, तानों और जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीने की कोशिश करती है। यह कहानी हर उस महिला की आवाज़ है, जो चुप रहकर भी बहुत कुछ सहती है।

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बंधन प्यार का

आज मंगल कार्यालय में शहनाई के सुमधुर स्वर गूंज रहे थे. मेहमानों का आना शुरू हो चुका था. शादी में रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों को निमंत्रण दिया गया था.रात को विवाह संपन्न हुआ. सभी मेहमान भोजन करके विदा हो गए. अब घर के सदस्य आपस में बातें कर रहे थे.

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“क्यों टूट रहे हैं रिश्ते?

“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”

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जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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