
शावर भकत ‘भवानी ‘
गलतियाँ भी
सही होने या सही करने के लिए
नैसर्गिक मार्गदर्शक बनकर
स्व-पथ निर्माता
बनने की ओर ले जाती हैं।
विदित है कि
गलतियों के भय से
अकर्मण्य बने रहना
गलतियों में ही विद्यमान होना है।
वस्तुतः गलती नहीं करना
नवीन सीखने की चेष्टा मात्र से भी
पृथक हो जाना है।
तर्कसंगत भी है कि गलतियाँ
किए बिना सीखना असंभव है।
ऐसे में मेरी गलतियाँ ही मेरी
नैसर्गिक गुरु हैं, क्योंकि
ये गलतियाँ ही
स्व-अन्वेषण की नींव हैं।
व्यक्तित्व के सुदृढ़ीकरण के लिए
गलतियों को दोहराना
कदापि तर्कसंगत ही नहीं,
अपितु दुर्बल इच्छाशक्ति का द्योतक है।
ऐसे में गलतियों को
दोहराने से परहेज करना
मेरी आवश्यकता ही नहीं,
अपितु अनिवार्यता भी रही।
सिखाने के लिए
निमित्त बनकर गलती या गलतियों
का आना भले पर्याप्त न हो,
परंतु नया कुछ सीखने के लिए
एक गलती ही पर्याप्त है।
अविलंब गलतियों को
आदत बनाने के बजाय
गलती को सीख
बना लेना उत्तम ही नहीं,
बल्कि स्व-आविर्भाव है।
ज्ञात है कि आदत छूटे नहीं छूटती,
लेकिन सीख आमरण
याद रह जाती है
या सम्भवतः उसके बाद भी।
