
अमिता श्रीवास्तव
मेहमानों से भरा घर धीरे-धीरे खाली होने लगा था। शादी के कार्यक्रम समाप्त होते ही सबको वापस जाने की जल्दी हो जाती है। बड़ी दीदी को मैंने मनुहार करके रोक लिया था कि, “इसी बहाने नई बहू के साथ थोड़े दिन और रह लोगी, नहीं तो एक बार जाकर दोबारा कहाँ जल्दी आना होता है।” वो मान भी गई थीं।
लेकिन जाते-जाते एक मंत्र मेरे कान में फूँक गईं, “बहू का मायका इसी शहर में है, रोज जाने को तैयार रहेगी मेरी वाली की तरह। शुरू से ही थोड़ी सख्ती रखना।” मैंने भी उनकी बात गाँठ बाँध ली। पग फेरों के लिए सुबह भेजा, शाम को बुला लिया।
अपनी शांत, सुंदर-सलोनी-सी बहू का मैं पूरा ध्यान रखती। वो भी घर के कामों में मेरा हाथ बँटाने लगी थी।
“मम्मी जी, आज मैं अपने मम्मी-पापा से मिल आऊँ?” उसने पूछा तो मैंने झट कह दिया, “बहू, आज मंगलवार है, शाम को प्रसाद चढ़ाने मंदिर चलना है।”
कभी साईं-संध्या तो कभी घुटनों के दर्द के बहाने मैं उसे रोक लेती। एक शांत-सौम्य मुस्कान के साथ वो मेरी बात मान जाती।
एक दोपहर मैं रोटियाँ बना रही थी तो उसने पूछा, “मम्मी जी, मेरी चेन्नई वाली मौसी आई हुई हैं, मैं शाम को उनसे मिल आऊँ?”
“लेकिन, आज तो……”
वो बीच में ही मेरी बात काटते हुए बोली, “ठीक है, आपको मेरा वहाँ जाना पसंद नहीं है तो मैं नहीं जाऊँगी।”
रोटी बेलते मेरे हाथ रुक गए। मेरी चोरी पकड़ी गई थी। मैं हड़बड़ाकर पलटी। वो मेरे पीछे ही थी। चेहरे पर वही शांत-सौम्य मुस्कान।
मुझे लगा, मैं किसी दर्पण के सामने खड़ी हूँ, जिसमें मेरी छवि बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।
