
प्रमिला त्रिवेदी
सुनहरी ढलती सांझ में,
तेरी याद चली आती है,
खामोश हवा के झोंकों संग,
कोई बात कह जाती है।
डूबते सूरज की किरणों में,
तेरा चेहरा नज़र आता है,
दूर कहीं जब पंछी लौटें,
मन भी तुझ तक उड़ जाता है।
तुम पास नहीं, फिर भी जैसे,
हर पल मेरे साथ हो तुम,
इस सूने मन की धड़कन में,
एक मीठी-सी आस हो तुम।
काश, आज की इस सांझ में,
तुम अचानक सामने आ जाओ,
बिन कुछ कहे मेरी आँखों से,
मेरे सारे भाव पढ़ जाओ।
सांझ ढले, रात उतर आए,
पर ये इंतज़ार न ढल पाए,
तुम लौटो तो यूँ लगे जैसे,
मेरी दुनिया फिर मुस्काए।
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अच्छी कहानी 👌