कीर्ति राणा और जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर पूज्य अवधेशानंदजी की मुलाकात

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
पिछले दिनों मैंने अपने गुरु और वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की फेसबुक पोस्ट देखी, जिसमें वे जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर पूज्य अवधेशानंदजी महाराज से बातचीत कर रहे थे। उनके साथ हमारे मित्र और सहयोगी रहे वरिष्ठ पत्रकार-संपादक विनोद सिंह और निरुक्त भार्गव भी थे। उस पोस्ट में कुछ फोटो और एक वीडियो भी था। वीडियो देखकर लगा कि कुछ मुलाकातें अचानक नहीं होतीं। वे मन में बहुत पहले जन्म ले चुकी किसी इच्छा के धीरे-धीरे आकार लेने का परिणाम होती हैं। उज्जैन में राणा सर और पूज्य अवधेशानंदजी की मुलाकात भी ऐसी ही थी।
कीर्ति राणा ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में बड़े-बड़े लोगों से बातचीत की है। सत्ता, समाज और सार्वजनिक जीवन की चर्चित हस्तियों के सामने उन्होंने हमेशा अपनी बेबाकी बनाए रखी। सामने वाला कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, सवाल पूछते समय उनके भीतर का पत्रकार कभी संकोच में नहीं पड़ा।
लेकिन अवधेशानंदजी के सामने उनका अनुभव कुछ अलग था। मुझे लगा, यह उनके लिए महज एक पत्रकार और संत की मुलाकात नहीं थी।
अवधेशानंदजी से मिलने की इच्छा उनके मन में पहले से थी। शायद इसी वजह से वह क्षण सामने आया तो उनकी सहजता में एक हल्की-सी झिझक उतर आई।

वे नर्वस दिखाई दिए। यह उनके वीडियो में स्पष्ट नजर आ रहा है। लेकिन यह घबराहट किसी दबाव की नहीं थी। उसमें एक प्रशंसक की खुशी, आत्मीयता और गहरा सम्मान शामिल था। बातचीत के दौरान उनका ध्यान पूरी तरह अवधेशानंदजी पर था। चेहरे पर सहज मुस्कान थी, आँखों में उत्सुकता और आवाज में सामान्य दिनों की तुलना में अधिक विनम्रता। वे शब्दों को जैसे थोड़ा ठहरकर चुन रहे थे। सामने वाला बोलता तो वे पूरे मन से सुनते।
यह दृश्य अपने आप में दिलचस्प था। जो व्यक्ति दूसरों से सवाल पूछते हुए अपनी बात पूरी दृढ़ता से रखता है, वही उस दिन सामने बैठे व्यक्ति की बात को बिना किसी जल्दबाजी के सुन रहा था। शायद इसलिए कि उस क्षण सवालों से ज्यादा महत्वपूर्ण मुलाकात थी।हम जिन लोगों को दूर से देखते हैं, उनके प्रति मन में एक अलग तरह का भाव बन जाता है। उन्हें पढ़ते-सुनते हुए उनसे मिलने की इच्छा होती है। फिर जब वह व्यक्ति अचानक हमारे सामने होता है तो मन के भीतर जमा उत्साह चेहरे पर उतर आता है। बातचीत सामान्य होते हुए भी हमारे लिए असाधारण बन जाती है। कीर्ति राणा के हावभाव में भी यही दिखाई दे रहा था। उनकी देहभाषा में सजगता थी, बातचीत में संयम और चेहरे पर उस इच्छा के पूरा होने की संतुष्टि, जिसे वे लंबे समय से अपने भीतर लिए हुए थे।

शायद उस समय उनके मन में यह भाव भी रहा हो—इनसे मिलने की इच्छा थी और आज मैं इनके सामने सालों बाद खड़ा हुआ हूँ। शायद पिछले सिंहस्थ में उनकी मुलाकात हुई होगी। मुझे वीडियो और फोटो में ऐसा लगा कि ऐसे क्षणों में आदमी अपने पद या पहचान से थोड़ा पीछे हट जाता है। पत्रकार, लेखक, अधिकारी या कोई भी पेशेवर पहचान कुछ देर के लिए गौण हो जाती है। सामने रह जाता है सिर्फ एक मन, जो किसी ऐसे व्यक्ति के सान्निध्य को महसूस कर रहा होता है, जिसे उसने अपने भीतर विशेष स्थान दे रखा है। राणा सर के साथ भी शायद यही हुआ।
उनकी नर्वसनेस उनकी बेबाकी के विपरीत नहीं थी, बल्कि उसी व्यक्तित्व का एक मानवीय पक्ष थी। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा होता है, जिसके सामने शब्द थोड़े संभलकर निकलते हैं। यह संकोच कमजोरी नहीं, बल्कि भीतर के सम्मान की सहज अभिव्यक्ति होता है।
यह मुलाकात इसलिए भी यादगार बन गई कि उसमें पत्रकार की निर्भीकता के साथ एक संवेदनशील इंसान दिखाई दिया। बड़े-बड़े लोगों से बेबाकी से बातचीत करने वाले कीर्ति राणा उस दिन कुछ क्षणों के लिए ठहर गए थे। किसी सवाल के कारण नहीं, किसी दबाव के कारण नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के प्रति अपने मन में बसे प्रेम और सम्मान के कारण, जिससे मिलने की इच्छा उन्होंने लंबे समय से संजो रखी थी। शायद कुछ मुलाकातों की खूबसूरती इसी में होती है कि उनमें कहे गए शब्दों से ज्यादा अनकहे भाव याद रह जाते हैं। अवधेशानंदजी के साथ कीर्ति राणा की वह मुलाकात भी ऐसी ही एक स्मृति है, जहाँ एक बेबाक पत्रकार के भीतर छिपा प्रशंसक कुछ देर के लिए सामने आ गया था।
