महिदपुर रोड के बाजार में दुकान के बाहर रखी पारंपरिक कुर्सी का दृश्य

कुर्सी का किस्सा: यादों में बसती एक परंपरा

महिदपुर रोड के बाजार में दुकानों के बाहर रखी एक साधारण कुर्सी कभी व्यापार की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक हुआ करती थी। यह कुर्सी बताती थी कि दुकान की ‘बोनी’ हुई है या नहीं, और इसी के साथ जुड़ी थी आपसी समझ, अपनापन और बाजार की अनकही भाषा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यह कुर्सी अब भी उन सुनहरी यादों को जीवित रखे हुए है।

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घर की राशन दुकान पर बातचीत करती लड़की और बुजुर्ग महिला का दृश्य

खुराफात

खुराफात एक रोचक संस्मरणात्मक कहानी है जिसमें एक लड़की की अजीब चालाकी और उससे जुड़ी घटना का दिलचस्प वर्णन है। यह कहानी रिश्तों, मासूमियत और जीवन के अनोखे अनुभवों को हल्के हास्य के साथ प्रस्तुत करती है।

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सिगड़ी के पास सिमटी यादें

सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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चर्चे थे मुख्तियार भाई की बेलबॉटम की मोरी के

जब राजेश खन्ना का जादू ढल रहा था और अमिताभ बच्चन का दौर उभर रहा था, तब कस्बाई जवानी भी बड़े परदे की नकल में अपने सपने सिलवा रही थी। महिदपुर रोड पर फैशन का मतलब था मुख्यत्यार भाई की बेलबॉटम की मोरी, जमीन से रगड़ खाती पैंट और उसे बचाने के लिए लोहे की चेन का अनोखा जुगाड़। यह सिर्फ पहनावा नहीं था, बल्कि उस समय की जवानी का स्वाभिमान, जिद और रचनात्मकता थी, जिसने छोटे शहर को भी अपने तरीके से ‘स्टाइलिश’ बना दिया।

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रात के नौ बजे, जब किस्मत जागती थी…

रात के ठीक नौ बजते ही महिदपुर रोड की रफ्तार बदल जाती थी। दादाभाई की दुकान के आसपास भीड़ सिमटने लगती, आँखों ही आँखों में फैसले हो जाते और किस्मत अपने पत्ते खोलने को तैयार रहती। नंबर खुलते ही कोई भीतर ही भीतर टूट जाता, तो कोई ऑपरेशन थिएटर के सफल होने जैसी राहत महसूस करता। वलन मिलते ही गर्म दूध के कड़ाह चढ़ जाते, मावाबाटी और रबड़ी के ऑर्डर लगते और पुरानी उधारियाँ मिठास में घुलकर उतर जातीं।यह सिर्फ़ सट्टे का खेल नहीं था. यह एक पूरे कस्बे की रातों की धड़कन थी।

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मुझे ज़िंदगी में तिजारत करना नहीं आया

जिसे जीवन में तिजारत नहीं, इंसान बने रहना सिखाया गया। पिता की सुरक्षा-केंद्रित सोच, मेले की छोटी-सी नौकरी और पहला व्यापारिक असफल अनुभव सब मिलकर यह बताते हैं कि हर हार नुकसान नहीं होती, कुछ हारें मनुष्यता बचा लेती हैं।

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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नेशनल बुक रीड डे : किताबों के साथ एक दिन

आज का नेशनल बुक रीड डे केवल एक तारीख नहीं, बल्कि किताबों के साथ समय बिताने, उन्हें पढ़ने और उनकी संगति का आनंद लेने का अवसर है। पढ़ना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है—यह तनाव कम करता है, याददाश्त और एकाग्रता बढ़ाता है, और कल्पनाओं को उड़ान देता है। किताबें हमें इतिहास से जोड़ती हैं, सोच बदलती हैं, और जीवन को नई दिशा देती हैं। चाहे बच्चों को पढ़कर सुनाएँ, दोस्त या परिवार के साथ साझा करें, या अकेले अपने कोने में बैठकर पढ़ें—किताबों का असली आनंद अनुभव और आत्मा से जुड़ने में है।

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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