
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
मेरी माँ शुरू से ही हिम्मत और हौसले की प्रतिमूर्ति थी. उनके पिता राजनीति में ईमानदार कार्यकर्ता थे. जनसंघ के दिनों में इसलिए ज़्यादातर समय घर से बाहर ही रहते. घर में फाकामस्ती आम बात थी. सबसे बड़ी होने के कारण घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ माँ के नन्हे कंधों पर आ गिरीं. भाई-बहनों को संभालना, पालना-पोसना ममता शायद उन्हें विरासत में नहीं, जिम्मेदारी में मिली थी.
पढ़ाई ज़्यादा नहीं हो पाईसिर्फ चौथी जमात तक. मगर यह अधूरी पढ़ाई भी उनके भीतर एक पूरा संसार रच गई थी. अख़बार वह पूरा पढ़ लेती थीं, समझ लेती थीं. लिखना बस हस्ताक्षर तक सीमित था, पर समझ की कलम बहुत आगे तक चलती थी. हमारे बाबूजी शिक्षक थे. किताबों से उनका गहरा नाता था. जो कुछ पढ़ते, माँ को ज़रूर सुनाते…कभी कहानी, कभी देसी नुस्खा. बाबूजी की पढ़ने की आदत और माँ की जिज्ञासा ने उनके सामान्य ज्ञान को इतना समृद्ध कर दिया कि पढ़ाई की कमी कभी खलती नहीं थी.
माँ मेहनती थीं, स्वाभिमानी थीं. पर हालात कई बार ऐसे बने कि उन्हें वह भी सहना पड़ा जो वह नहीं चाहती थीं. स्वाभिमान को चोट लगती तो वह मालवी में कहतीं- आग एक आड़ी बरे और मूं दूसरी आड़ी.
मतलब अगर स्वाभिमान को ठेस पहुंची तो अंदर आग की तरह आग की लपटें उठती है. इसलिए वह अपने स्वाभिमान का बहुत ध्यान रखती थीं..चुपचाप, पर अडिग.
बाबूजी ने उन्हें आगे पढ़ाने की बहुत कोशिश की. पर माँ ने जीवन भर अनपढ़ रहना स्वीकार कर लिया. वजह? यह डर कि पढ़ाते समय अगर कभी बाबूजी का हाथ उठ गया, तो यह सिलसिला शुरू हो जाएगा और वह किसी भी क़ीमत पर ऐसा नहीं चाहती थीं. इसलिए उनकी औपचारिक शिक्षा चौथी जमात पर ही थम गई. सबूत हमारे पास नहीं, पर उनके पढ़ने-समझने के ढंग से हम जानते थे…कम से कम चौथी तो उन्होंने पढ़ी ही थी, क्योंकि वह अखबारों की हेडलाइन धीरे-धीरे पढ़ लेती थी. मां की उम्र और जन्मतिथि हमें बराबर याद नहीं है. जब उनसे पूछते थे..जन्मतिथि? वह भी एक मेले के सहारे याद रहती थी.. बारह साल में लगने वाला पढ़ौती माता का मेला. एक मेले में वह छह महीने की थीं…बस इतना ही उन्हें पता था. सही उम्र कभी तय नहीं हो पाई. पर इतना तय था कि हालात जैसे भी रहे हों, माँ जीवट थीं. हर परिस्थिति से डटकर मुकाबला किया. परिवार के लिए सब कुछ न्यौछावर करने को हमेशा तैयार.
मुझे आज भी याद हैजब कभी बाबूजी ग़ुस्से में होते, माँ ही हमारी ढाल बनती थीं. बाबूजी कहते…तू घणी हेमात भरे अणकी…(तू इसका बहुत पक्ष लेती है.)
और माँ आख़िर तकमेरे ही पक्ष में रहीं. अस्पताल में भी उन्होंने देह तभी छोड़ी, जब मैं उनके पास पहुँच गया. मेरा हाथ उनके हाथ में था. वह बोल नहीं सकीं…पर वेंटिलेटर की हरी रेखाओं के ऊपर-नीचे होने से मुझे समझ आ गया…माँ जान गई थीं कि मैं आ गया हूँ. शायद वही उनकी आख़िरी तसल्ली थी.
यादों के इस स़फर में बाई के किस्से आगे भी चलते रहेंगे. हो सकता है, इन्हें पढ़ते हुए आपको भी अपनी माँ के त्याग, चुप्पी और मज़बूती का एहसास हो…
इसी भाव के साथ..सभी माँओं को मेरा विनम्र अभिवादन.

सादर प्रणाम करती हूँ 🙏💐
माँ..ही सिर्फ माँ होती हैं अन्य नहीं
मातृ सम्मान को नमन। हर औरत के अंदर एक मां है, किसी भी औरत को अगर उस रूप में देखा जाए, तो शायद ही कोई उसे अपमानित करने के बारे में सोचेगा ।
निःशब्द 😢🙏🙏
मां ,मां होने के क्रम में खुद को भूल जाती हैं,अच्छा संस्मरण लिखा है ,आपने
माँ को सादर नमन 🙏
हर माँ को प्रणाम 🙏
माँ को सादर प्रणाम 🙏
माँ को सादर प्रणाम 🙏