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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

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