यात्रा, जो लौटकर भी साथ रही

शिर्डी यात्रा और हिंदी साहित्यिक अधिवेशन में शामिल साहित्यकारों और साथियों के साथ बिताए आत्मीय और यादगार पल।

शिर्डी के चार दिन… और उम्रभर की यादें

रीमा राय सिंह, मुंबई

कुछ यात्राएँ केवल किसी स्थान तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं, वे मन के भीतर भी बहुत दूर तक उतर जाती हैं।
हिंदी साहित्य भारती के त्रिदिवसीय अधिवेशन की यह यात्रा भी मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही सीख, अपनापन, जिम्मेदारियाँ, हँसी, मित्रता और अनगिनत सुंदर स्मृतियों से भरी हुई।

कार्यक्रम 16 से 18 तारीख तक आयोजित था, लेकिन आयोजन की विभिन्न जिम्मेदारियों के कारण हम सभी को 15 तारीख को ही शिर्डी पहुँचना था। कारण भी विशेष था।

हिंदी साहित्य भारती के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष IPS कृष्ण प्रकाश ने मुझे आयोजन की स्वागत समिति में “स्वागत अध्यक्ष” का दायित्व सौंपा था। नई चुनौतियाँ मुझे हमेशा आकर्षित करती हैं। कुछ नया सीखने और उसे पूरी निष्ठा से निभाने का उत्साह शायद मेरे स्वभाव का हिस्सा है। इसलिए मैंने तय किया कि कार्यक्रम आरम्भ होने से एक दिन पहले पहुँचकर सारी व्यवस्थाओं को निकट से समझा और सँवारा जाए।

15 तारीख की शाम हम सभी संस्था के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय डॉ. रवींद्र शुक्ला जी के साथ कार्यक्रम स्थल पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा महसूस होने लगी थी। अगले दिन की तैयारियों को लेकर शुक्ला जी पहले ही आवश्यक निर्देश दे चुके थे और हमने भी मन ही मन कई योजनाएँ बना रखी थीं। बस फिर क्या था. उसी शाम से तैयारियों का सिलसिला शुरू हो गया।

16 तारीख की सुबह हम लगभग 11 बजे ही कार्यक्रम स्थल पहुँच गए। उत्साह इतना था कि थकान जैसे कहीं पीछे छूट गई थी।

कहीं स्वागत के लिए विशाल रंगोली बनाई जा रही थी, कहीं मंच की सजावट को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तो कहीं अतिथियों के स्वागत हेतु थालियाँ सजाई जा रही थीं। यह सब काम हम पहले भी कई बार कर चुके थे, लेकिन उस दिन बात कुछ अलग थी। शायद इसलिए क्योंकि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का व्यवहार परिवार जैसा था।

आदरणीय शुक्ला जी और झाँसी से आई पूरी टीम ने इतना आत्मीय सहयोग दिया कि कभी लगा ही नहीं कि हम किसी औपचारिक आयोजन का हिस्सा हैं। हर कोई एक-दूसरे का हाथ थामे, मुस्कुराते हुए काम कर रहा था। वातावरण में अपनापन इतना घुला हुआ था कि जिम्मेदारियाँ भी बोझ नहीं, उत्सव जैसी लग रही थीं।

स्वागत की जिम्मेदारी निभाने में मेरी मुंबई की साहित्यकार सखियों और प्रिय मित्रमंडली ने भी भरपूर साथ दिया। हम सब मिलकर इतने आनंद और आत्मीयता से काम कर रहे थे कि कब काम उत्सव में बदल गया, पता ही नहीं चला। हँसी-मज़ाक, भागदौड़, सजावट और तैयारियों के बीच समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा था। सच कहूँ तो हमने केवल जिम्मेदारियाँ नहीं निभाईं, उन पलों को पूरी तरह जिया।

रवि यादव , रोशनी किरण रीमा राय सिंह, विनीता यादव, आनंद सिंह

और इसी बीच… यात्रा की बात तो जैसे पीछे ही छूट गई थी।

यात्रा भी अपने आप में बेहद यादगार रही। हम पाँच लोग साथ थे
आकाशवाणी के उद्घोषक एवं वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय आनंद सिंह,
प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, अभिनेता एवं कवि रवि यादव,
उनकी पत्नी विनीता जी,
रोशनी किरण जी
और मैं।सुबह 6 बजे शुरू हुआ सफर कब दोपहर 12 बजे तक पहुँच गया, हमें पता ही नहीं चला। और यदि सफर में रवि जी और विनीता जी साथ हों, तो हँसी का सिलसिला रुकना मुश्किल ही है। उन चार दिनों में न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब हम हँसते-हँसते खुद को संभाल नहीं पाए और उनमें सबसे आगे शायद मैं ही थी। इन सबके बीच एक बात हमने विशेष रूप से महसूस की शिर्डी केवल आस्था का स्थान ही नहीं, बल्कि बेहद सुरक्षित शहर भी है।भले ही वह बहुत बड़ा शहर नहीं है, लेकिन वहाँ का वातावरण इतना सहज और सुरक्षित लगा कि हम पूरी तरह निश्चिंत होकर घूमते रहे।कार्यक्रम के दूसरे दिन मैं, रोशनी जी और विनीता जी खरीदारी करने निकल पड़े। दुकानों पर घूमते-घूमते, बातें करते-करते और फिर आइसक्रीम खाते हुए कब रात के 12 बज गए, इसका एहसास ही नहीं हुआ।

हम आराम से टहलते हुए विश्राम गृह लौट आए और वहाँ पहुँचकर जब समय देखा, तब समझ आया कि आधी रात बीत चुकी है। लेकिन उस पूरे समय में मन में कहीं भी असुरक्षा या भय का भाव नहीं आया। शिर्डी को लेकर यह अनुभव मन में एक अलग ही सम्मान छोड़ गया।

उन चार दिनों में हमने केवल एक कार्यक्रम सम्पन्न नहीं किया, बल्कि साथ मिलकर ढेर सारी यादें संजोईं। बहुत मस्ती की, अनगिनत बातें कीं, साथ भोजन किया, साथ काम किया और साथ खुलकर हँसे।

कार्यक्रम अपनी भव्यता और सफलता के लिए हमेशा स्मरणीय रहेगा, लेकिन उससे भी अधिक याद रहेंगे वे चार दिन जो सचमुच पलक झपकते बीत गए।

कुछ दिन पहले मैंने एक रील में एक पंक्ति सुनी थी—“यात्रा हमेशा उसी व्यक्ति के साथ करनी चाहिए, जिसके साथ आपका मन, व्यवहार और व्यक्तित्व मेल खाता हो।”उस समय यह बात केवल अच्छी लगी थी, लेकिन इस यात्रा ने उसका वास्तविक अर्थ समझा दिया। जब साथ में अपने जैसे लोग हों, तो सफर केवल दूरी तय नहीं करता… वह दिलों को भी और करीब ले आता है।यह अधिवेशन मेरे लिए केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि जीवन के उन सुंदर अनुभवों में से एक बन गया, जिन्हें याद करके आज भी चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है।

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One thought on “यात्रा, जो लौटकर भी साथ रही

  1. पढ़कर ही आनंद आ गया! आप सबको स्नेहिल बधाइयाॅं!

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