मुझसे मुझ तक…

सरिता सिंह “ नेपाली “ बेतिया ,पश्चिम चंपारण (बिहार )

थोड़ी-सी व्यस्तता और थोड़ी-सी बीमारी के कारण मैं अपनी ही लिखी कविता पर आए कमेंट्स पढ़ नहीं पाई थी. आज जब उन्हें पढ़ने बैठी तो पाया कि मेरे नए मित्रों ने मुझ पर प्रश्नों की मानो बौछार ही कर दी है.
प्रेम पर जब भी चर्चा होती है, लोग या तो अपनी पीड़ा की गठरी खोल बैठते हैं या फिर मुझे समझाने लगते हैं कि प्रेम क्या है और क्या नहीं. एक-एक कर सबको उत्तर देना संभव नहीं था, इसलिए सोचाआज मैं भी अपने मन की बात लिख ही दूँ.
अमृता प्रीतम एक लेखिका थीं. उन्होंने लेखक साहिर लुधियानवी से प्रेम किया. वह प्रेम आज भी जीवित है, जिसने दोनों को अमर बना दिया. उनके गीत हों या उपन्यास सबमें अथाह प्रेम की संजीदा गाथाएँ गुँथी हुई हैं.

हम सभी ने उन्हें अपने हृदय से अपनाया और उन्हें उतना ही सम्मान दिया. इससे सिद्ध होता है कि प्रेम आदिकाल से लेकर अनादिकाल तक अमर था, अमर है और अमर रहेगा.
मैं कवियित्री हूँ. लिखना मेरी निजता है. मेरे लिए यह वह स्थान है, जहाँ मैं पूरे ब्रह्मांड को अपनी कविताई की दृष्टि से देख सकती हूँ. तब समझ नहीं आता कि लोग क्यों मुझे समझाने बैठ जाते हैं कि प्रेम क्या है और क्या नहीं! प्रेम की आहटें जब रूह से सुनी जाती हैं, तो वे करुणा में डूब जाती हैं. तब न वहाँ शरीर की भूख होती है, न स्वार्थ की कोई छाया. वहाँ तो केवल पीड़ा को अपनाने की सहज आदत होती है. जब कोई आपके सीने से लगकर बेसुमार रो पड़ता है, तभी समझिए प्रेम का बीज अंकुरित हुआ है, जो धीरे-धीरे विशाल, सघन वृक्ष में बदल जाएगा और आने वाले नवजीवन का पर्याय बनेगा.
मैं कवियित्री हूँ. अपने भीतर उठते भावों को अश्रुओं की तरह बह जाने देती हूँ. मुझमें पीड़ा का भार उठाने की शक्ति नहीं. मुरझाई पंखुड़ियाँ भी मुझे दुख देती हैं. पर मैं जानती हूँयही जीवन है, यही हमारी सामूहिक रवानी है. और फिर भी, हर सुबह ताजे और मनमोहक फूलों से लदी डालियाँ जीवन में नई ऊर्जा भर ही देती हैं.
सोचती हूँ. हारता कहाँ है कमल, जो दस-बारह घंटे जीकर भी खिला रहता है; उदास कहाँ होती है आम्रपाली, अपनी मंजरी खोने के बाद भी; और रेत कहाँ आसक्त होती है, जब वह समुद्र में दूर तलक फैल जाती है. तो फिर आदमी क्यों हार मान ले, किसी से प्रेम में बिछड़ने के बाद?
प्रेम मेरे लिए कभी प्रश्न नहीं रहा. क्योंकि मैंने देखा है उन तृणों को ओस की बूँदों को थामते हुए… मैंने देखा है उन नन्हें जीवों को अपनी माँ को खोजते हुए… मैंने देखा है तपिश में बदरा के लिए धरती को तड़पते हुए… और पतझड़ को बसंत की याद में बिलखते हुए.मेरे लिए तो यही है प्रेम की सबसे संजीदा कहानी.

2 thoughts on “मुझसे मुझ तक…

  1. ऐसा ,आपके सिवाय,और कौन लिख पाया प्रेम पे आज तक

    बहुत ही सुंदर लिखा
    You are genius

    1. मैं देश का अदना सा सड़क छाप शायर हूं। न खाने को रोटी,न रहने की झोपड़ी और न पहनें का वस्त्र। फिर भी, मैं प्रेम दीवाना हूं। आपने जिस अनमोल प्रेम का वर्णन किया है।जिस संवेदना और गहराई से इश्क की अद्भूत व्याख्या की है।वह काबिले तारीफ है। मैं आपके प्रेम विचारों से लाखों प्रतिशत सहमत हूं। वैसे मुझे आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है।टूटा – फूटा और लूटा पागल दिल है।जो मैंने वर्षों आपके चरणों में समर्पित कर दिया था।

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