कुछ अनकही …
सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।
कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।
ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह है — जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ते हुए हमें आगे ले जाती है। हर पड़ाव पर कुछ न कुछ पीछे छूट जाता है — कोई शहर, कोई गलियां, कुछ अपने लोग। लेकिन जो सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं छूटते। वे ठहरे रहते हैं — हमारी यादों में, हमारी भावनाओं में, और उस अगली मुलाक़ात की उम्मीद में, जैसे स्टेशन पर खड़े वे लोग जो ट्रेन गुज़र जाने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलाते रहते हैं… यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।
अरसे बाद जब मैंने अपनी यादों से भरी डायरी खोली, तो एक अजीब-सी गंध ने मुझे घेर लिया — जैसे बीते हुए दिनों की धूल ने अचानक साँसों में जगह बना ली हो। हर पन्ना, हर शब्द, किसी पुराने खंडहर की दीवार-सा झरता हुआ लगा। मैं उन पलों को छूना नहीं चाहती थी, फिर भी वे मुझे अपने भीतर समेटने लगे। अतीत का हर कोना एक कहानी था — अधूरी, चुभती हुई, फिर भी ज़िंदा।
आज हमें किसी बहाने से परखा नहीं जाना चाहिए। दिल चाहता है कि हम सिर्फ उसी के दिल में रहें और किसी और ठिकाने की तलाश न करें। अगर बरसना है तो पूरी ताकत से बरसें, क्योंकि बाद का मौसम सुहाना नहीं चाहिए। हमें काम करते रहना चाहिए, राह में चलते रहना चाहिए, और व्यर्थ में समय गंवाना ठीक नहीं। नई खोज और नए काम होने चाहिए; वही पुराने राग हमें नहीं चाहिए। मुश्किलों में जो काम आता है, उसे बाद में नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वे भावनाएँ और ख़त, जो हमने लिखे हैं, उन्हें जलाना नहीं चाहिए। और जब दर्द मिले, उसे आँखों से महसूस करो; आँसुओं को दबाना ठीक नहीं।
मंजुला श्रीवास्तवा, प्रसिद्ध साहित्यकार, परत दर परत सी ज़िंदगी,कुछ चीन्ही, कुछ अनचीन्ही सी,कुछ अनुभूत तत्व कथ्य सी,कुछ परिधि में, कुछ परिधि से बाहर,कुछ कही, कुछ अनकही सी।परत दर परत सी ज़िंदगी,क्या कहूँ, किससे कहूँ। एक वो जो हम हो नहीं पाए,या तुमने होने नहीं दिया।एक मानचित्र जो नक्शे में है,और एक जो तलुओं और हथेलियों…
प्रेम मेरे लिए कभी प्रश्न नहीं रहा।
मैंने देखा है तृणों को ओस की बूँदों को थामते हुए,
नन्हें जीवों को अपनी माँ की खोज में भटकते हुए,
धरती को तपिश में बादलों के लिए तड़पते हुए,
और पतझड़ को बसंत की याद में बिलखते हुए।
मेरे लिए तो यही है प्रेम की सबसे संजीदा कहानी जहाँ पीड़ा भी करुणा में ढल जाती है,
और आँसू भी कविता बनकर बह निकलते हैं।