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हम बच्चे हैं…

हमें ऐसे आश्चर्य से मत देखो-
माना कि हमारे चारों ओर टूटी हुई इमारतों
का मलबा ही मलबा है, और हवा में घुल गई है,
बारूद की गन्ध जो अब सांसों के सहारे,
अन्तर्मन को भी झकझोर रही है;
फिर भी हम बेफिक्री से खेल रहे हैं अपने ही अंदाज में,
झूम रहे हैं मस्ती में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर;

हमारे हँसने पर मत जाओ-
क्या तुम नाप सकोगे हमारे विषाद के महासागर
की गहराई को?
फिर भी देखो, हमारी हँसी कितनी निश्छल है,
और कितनी दिलकश भी!

हमें मालूम है कि यहीं कहीं आसपास बिखरी हैं लाशें
हमारे माता-पिता और प्रियजनों की, जो अब
खो गये हैं एक अभेद्य धुंध में कहीं;
पर हमें तो ज़िन्दा रहना है एक बीज की मानिंद;
हमें बढ़ना है इन सबके बीच, और बन जाना है
एक दिन मानवता का बटवृक्ष;

फिर देखो, आसमान भी तो चमक रहा है नीलापन लिए,
और सूरज भी जगमगा रहा है रोज़ की तरह;
हवाओं में गूँज रहा है चिड़ियों का शोर,
जिनके आगे खो गई हैं बन्दूकों और ड्रोन से गिरती
मिसाइलों की दहला देने वाली आवाजें!

हम खेल रहे हैं इन सबके बीच क्योंकि हम उम्मीद हैं-
एक नई सुबह की; नई रोशनी की आड़ में हमें
गढ़ना है एक नया भविष्य।

हम बच्चे ज़रुर हैं पर हम बीज हैं जो कल
बन जायेंगे, मानवता का बटवृक्ष।

डॉ. राकेश चन्द्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

2 thoughts on “हम बच्चे हैं…

  1. युद्ध की भीषणता दिखाकी, दिल को गहरे तक छूती अच्छी कविता.

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