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मैं कैसे हार मान लूं…

यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”

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हम बच्चे हैं…

यह रचना युद्ध और विनाश के बीच मासूम बच्चों की दृढ़ता और आशा को सामने लाती है। चारों ओर मलबा, बारूद की गंध और प्रियजनों की लाशों का दर्द भरा माहौल है, लेकिन बच्चे अब भी खेल रहे हैं, हँस रहे हैं और जीवन को थामे हुए हैं। उनकी हँसी एक विरोधाभास है—जहाँ दुख का महासागर गहरा है, वहीं उनकी निश्छलता और दिलकश मुस्कान उम्मीद की किरण जगाती है।

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