
एड.मनोज धाकड़, महिदपुर
यूट्यूब पर बेशर्मी को देखते-देखते आखिर आँखें कब शर्मसार होंगी? जी भरकर गंदगी खुलेआम परोसी जा रही है। सामाजिक व्यवस्थाएँ कुपोषण का शिकार हो रही हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर 84 लाख देवी-देवताओं के स्टेटस उतारे जाते हैं, उसी मोबाइल की आत्मा में पल रही एप्लीकेशनों में जो गंदगी भरी पड़ी है, अश्लीलता चिल्ला-चिल्लाकर समूचे समाज के सामने बेशर्मी ऐसे मंजर दिखा रही है कि जिसे यदि कलम के साथ शब्दों में व्यक्त किया जाए, तो कलम की आँखों से खून के आँसू टपक आएँगे। मगर इस अश्लीलता के खिलाफ समाज का हर वर्ग अंधा, गूंगा व बहरा बनकर शायद इस अश्लीलता को अपनी मौन स्वीकृति दे चुका है। तब लगता है, समूचा समाज, जिसे इस गंदगी के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करना चाहिए, वह कितना निकम्मा हो चुका है। हम कितने बेशर्म हो चुके हैं कि बद से बदतर गंदगी परोसे जाने के बावजूद चटकारे लेकर रीलें देखी जा रही हैं। नारी न केवल निर्वस्त्र हो चुकी है, बल्कि मोबाइल पर खुद नारी ने बेशर्मी के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं। अब न शर्म न नारी की आँखों में है और न ही नाचती-थिरकती बार-बाला के शरीर में। यूट्यूब ने समूचे समाज को निर्वस्त्र कर दिया। ढंके की चोट पर गंदगी को बेचकर हमें बेशर्मी के हाथों नीलाम किया जा रहा है। कभी आँखों में शर्म का पर्दा डला हुआ रहता था, मगर अफसोस, आज आँखें ऐसी गंदगी को देखकर भी शर्मसार नहीं हैं। यह न केवल एक सामाजिक अपराध है, बल्कि अपने ही परिवार और अपनों की जिंदगी के साथ संस्कारों की चिता में हम अपने ही हाथों अग्नि दे रहे हैं। समूचा समाज इस सच्चाई को स्वीकार कर ले कि हम आज संस्कारों के श्मशान में खड़े हैं। युवा पीढ़ी कल तक ग़ज़ल, कजरा, शबनम, सरगम, मेहंदी और पायल के गीतों पर थिरकती थी, तब समाज का प्रबुद्ध वर्ग एतराज दर्ज किया करता था। वही युवा आज संस्कारों की चौखट पर बेशर्मी के सामने नतमस्तक है। उसकी आँखों की पुतलियों में अपनी बहन-बेटियों की आबरू की रक्षा का जज़्बा दफन हो चुका है। अब न आक्रोश है और न लुटती-टूटती-बिखरती आबरू के खिलाफ कोई आंदोलन है। आईना जिस चेहरे को देख रहा है, हर उस चेहरे पर इस गुनाह के साथ समझौते की परछाईं को प्रतिबिंबित कर रहा है। पवित्र रिश्तों में वासना की बदबू मन-आँगन को प्रतिफलित करती कंक्रीट होती संवेदनाएँ महसूस होने लगी हैं।
एक समय था, जब वेश्याओं के बाजार में भी बेशर्मी पर अंकुश हुआ करता था, मगर आज यूट्यूब ने बेशर्मी को इतना शर्मसार कर दिया कि कोठे पर बैठकर अपने जिस्म की नुमाइश करने वाली वेश्या भी इस बेशर्मी से शर्मसार है। यूट्यूब की अर्धनग्न तस्वीरों ने समूचे समाज को नंगा कर दिया है। मगर अफसोस, जिस समाज ने मुल्क के राजसिंहासन को नैतिकता की जिम्मेदारी सौंपी, वह सत्ता हथियाने के हथकंडों में अपने सामाजिक दायित्व को भूल गया। देश की संसद में, पक्ष हो या विपक्ष, गर्मजोशी के साथ नेता चीखते-चिल्लाते दिखते हैं। आरोप-प्रत्यारोपों की मंडी में केवल राजनीतिक हथकंडों की नुमाइश की जा रही है। मगर अब वक्त आ चुका है, जब 13 साल की मासूम के साथ 32 लोगों ने 5 दिन तक हैवानियत और दरिंदगी भरा वहशी दुष्कृत्य किया, तब यूट्यूब की गंदगी को संसद के मानचित्र पर लाना होगा, वरना यह मुल्क वेश्याओं की मंडी का खुला बाजार बन जाएगा। अपने मुल्क की पीढ़ी देखते-ही-देखते पतित हो जाएगी। मुल्क की आत्मा के मंदिर संसद में बैठे नेताओं में कोई तो ऐसा हो, जो कृष्ण का सुदर्शन अपने हाथों में थामे शिशुपाल (यूट्यूब) की गर्दन का संहार करने का साहस करे, ताकि संस्कारों की आबरू और रिश्तों की पावनता को मुकम्मल बनाए रख पाए। यदि किंतु-परंतु की चंद टकराहटों में संसद में बैठा हर नुमाइंदा मौन धारण कर लेगा, तब 13 साल की मासूम के साथ दरिंदगी करने वाले भेड़ियों को सजाए मौत कैसे मिल पाएगी?
मासूम बेटी की जिंदगी जिंदा लाश में तब्दील हो गई, मगर देश की किसी गली, गाँव या चौराहे पर आज भी दिव्यह के शब्द कहीं सुनाई नहीं दिए। दरिंदगी आम इंसान के लिए समाचार-पत्रों और टीवी चैनलों की टीआरपी बनकर रह गई। इन भेड़ियों को सजाए मौत देने के बजाय इनके चारों हाथ-पैर काटकर शहर के चौराहे पर ताउम्र के लिए जिंदा छोड़ दिया जाए और मुँह से इन दरिंदों की जुबान काट दी जाए, ताकि भीख भी न मांग सकें। और इन दरिंदों को मुल्क के लिए कानून बनाने वाली संसद के सामने छोड़ दिया जाए। शायद तब उस मासूम की चीत्कारें मुल्क के राजनेता सुन पाएँ।
फिर भी यदि मुल्क के सत्तासीन और राजनेताओं ने इसे नजरअंदाज किया, तो माँ भारती की पुण्य धरा पर क्रांतिकारियों के हौसले जिंदा हैं, जो भरे बाजार दरिंदों की आँखों में लोहे की गर्म सलाखें दागने का हौसला रखते हैं। मगर अफसोस, जिनके पास कानून बनाने की ताकत है, यदि वे इस गंदगी के खिलाफ इतनी विभत्स घटना के बाद भी अपनी नपुंसकता को ब्रह्मचर्य की आड़ में छिपाने का पाखंड करते हैं, तब ये गंदी युक्तियाँ बेरोक-टोक फैलती रहेंगी और आने वाले कल में 32 नहीं, 64 दरिंदे पैदा होंगे और मासूम बेटियों की चीत्कारों से शहर, गाँव और गली के चौराहे गूंजते रहेंगे।
और एक दिन ऐसा आएगा, जब एक बेबस माँ अपनी कोख के पलने में झूलती बेटी की भ्रूण हत्या शायद केवल इसी कारण कर देगी…?
