“न कॉल, न मैसेज, न कोई वजह… आखिर क्यों रिश्तों में बढ़ रहा है घोस्टिंग का चलन ?”
आज के डिजिटल दौर में रिश्तों में घोस्टिंग एक आम समस्या बनती जा रही है। जानिए घोस्टिंग का अर्थ, इसके प्रभाव और इससे निपटने के तरीके।

आज के डिजिटल दौर में रिश्तों में घोस्टिंग एक आम समस्या बनती जा रही है। जानिए घोस्टिंग का अर्थ, इसके प्रभाव और इससे निपटने के तरीके।
यूट्यूब और सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लील सामग्री के बीच भारतीय संस्कार, पारिवारिक मूल्य और महिलाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर सामाजिक प्रश्नों पर यह लेख चिंता व्यक्त करता है। क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर परोसी जा रही गंदगी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए खतरा बनती जा रही है?
रील और वायरल होने की दौड़ में क्या रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं? जानिए कैसे सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव शादी, परिवार, दोस्ती और सामाजिक जीवन की भावनाओं को बदल रहा है.
प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि किसी की ख़ामोशी को समझ लेने का नाम है। सोशल मीडिया के इस दौर में रिश्ते जल्दी बन जाते हैं, लेकिन उन्हें खूबसूरत बनाए रखने के लिए प्रेम के साथ मर्यादा, सम्मान और संवेदनशीलता भी ज़रूरी है।
आज घरों में सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन रिश्तों में समय और अपनापन कम होता जा रहा है। यह लेख सिर्फ संयुक्त परिवारों के टूटने की नहीं, इंसानों के भीतर बढ़ते अकेलेपन की कहानी है।”
“भीड़ में अकेला” एक संवेदनशील हिंदी कहानी है, जो युवाओं के भीतर चल रहे मानसिक संघर्ष, सामाजिक दबाव और संवाद की कमी को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कहानी बताती है कि समय पर समझ, प्रेम और संवाद किसी की जिंदगी बदल सकते हैं।
आज के डिजिटल दौर में दोस्ती का मतलब सिर्फ आमने-सामने मिलना नहीं रह गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Instagram, Discord और WhatsApp ने रिश्तों की परिभाषा ही बदल दी है। खासकर COVID-19 lockdown के दौरान, लाखों लोगों ने ऑनलाइन दोस्त बनाए. ऐसे दोस्त जो कभी मिले नहीं, लेकिन दिल के बहुत करीब आ गए।
आजकल रिश्ते घरों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। दोस्त, नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी सब डिजिटल दुनिया में सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ती जा रही है। यह व्यंग्यात्मक लेख सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और आभासी संबंधों के माध्यम से आधुनिक समाज की विडंबना को उजागर करता है। लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या वाकई डिजिटल दुनिया उतनी ही रोचक है जितनी दिखती है?
हर साल शहरों के होटलों में ज़ीरो नाइट भव्यता से मनाई जाती है, लेकिन इस बार युवा लड़कियों ने नशे में अपनी मर्यादा खो दी। नशे और तेज़ गाड़ी के कारण कई दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें परिवारों की खुशियाँ भी मिट गईं। यह घटनाएँ समाज और संस्कृति पर प्रश्न खड़े करती हैं।
सोशल मीडिया के दौर में सच्ची और फर्जी खबरों के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है। बिना प्रमाण-पत्र के स्वयं को पत्रकार बताकर कुछ लोग बेबुनियाद खबरें फैलाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं, जिससे असली और जिम्मेदार पत्रकारिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जबकि सच्चा पत्रकार वही है जो निष्पक्षता, सत्य और सामाजिक दायित्व के साथ समाज और सरकार के बीच एक सेतु बनकर कार्य करता है।