
राकेश चंद्रा
आजकल मेरे सभी दोस्त, नाते-रिश्तेदार व पड़ोसी रहते हैं
मेरे मोबाइल में; हालाँकि उनके पास एक अदद मकान भी है रहने के लिए।
मकानों में तो सब लोग बँट जाया करते हैं अपने-अपने कमरों में, अपने मोबाइल फोन के साथ।
वे लोग खूब बतियाते हैं, हँसते हैं और कभी-कभार एक-दूसरे पर चिल्लाते भी हैं।
कुछ पलों के युद्धविराम के बाद फिर से वही सिलसिला अपने आप को दोहराता है।
सचमुच, समय के साथ कुछ भी नहीं बदलता।
इस तरह बातों-बातों में रिश्ते टूटते-जुड़ते हैं और मोबाइल सब कुछ निरपेक्ष भाव से देखता रहता है।
मोबाइल पूरा-पूरा सहयोग करता है, यदि कोई अपना ज्ञान बढ़ाना चाहता है। उसके अंदर छिपा है एक ज्ञान का ‘व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय’, जहाँ प्रवेश नि:शुल्क है हर किसी के लिए। न जाने क्यों मुझे लगता है कि शेखचिल्ली और मुंगेरीलाल भी इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे होंगे!
व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम व लिंक्डइन की आभासी दुनिया क्या सचमुच इतनी रोचक है?
एक विज्ञापन में एक बच्चा कहता है “खाओ और खुद जान जाओ!”
