मोबाइल फोन में व्यस्त परिवार के सदस्य, एक ही घर में अलग-अलग कमरों में स्क्रीन देखते हुए लोग

रिश्ते ऑनलाइन, एहसास ऑफलाइन

आजकल रिश्ते घरों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। दोस्त, नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी सब डिजिटल दुनिया में सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ती जा रही है। यह व्यंग्यात्मक लेख सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और आभासी संबंधों के माध्यम से आधुनिक समाज की विडंबना को उजागर करता है। लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या वाकई डिजिटल दुनिया उतनी ही रोचक है जितनी दिखती है?

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प्रेमपत्र से वंचित लेखक

यह लेख एक हास्य-व्यंग्य शैली में लिखा गया आत्मकथन है, जिसमें लेखक अपनी असफलता का कारण मज़ाकिया अंदाज़ में पत्नी को ठहराते हैं। वह बताते हैं कि जवानी में यदि पत्नी ने उनके प्रस्ताव पर तुरंत “हाँ” न कहा होता, तो उनके भीतर “दिल टूट रस”, “बेचारा रस” और “मजनूं रस” उमड़ते और वे शायरी, कविताएँ व लेखों के माध्यम से एक बड़े लेखक बन जाते। मगर पत्नी ने उन्हें प्रेम-पत्र लिखने या भावुक कविताओं में ढलने का कोई अवसर ही नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि लेखक के भीतर मौजूद सारे “रस” वातावरण के अभाव में बाहर ही नहीं निकल पाए। लेख हल्के-फुल्के हास्य, नोकझोंक और आत्मव्यंग्य के माध्यम से यह संदेश देता है कि जीवन की दिशा और रचनात्मकता अक्सर निजी परिस्थितियों और रिश्तों से प्रभावित होती है।

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