मोबाइल फोन में व्यस्त परिवार के सदस्य, एक ही घर में अलग-अलग कमरों में स्क्रीन देखते हुए लोग

रिश्ते ऑनलाइन, एहसास ऑफलाइन

आजकल रिश्ते घरों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। दोस्त, नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी सब डिजिटल दुनिया में सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ती जा रही है। यह व्यंग्यात्मक लेख सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और आभासी संबंधों के माध्यम से आधुनिक समाज की विडंबना को उजागर करता है। लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या वाकई डिजिटल दुनिया उतनी ही रोचक है जितनी दिखती है?

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भागती जिंदगी और खालीपन को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें समय की कमी, धन की दौड़ और सुकून से दूर होता आधुनिक मनुष्य दिखाई देता है

खाली हाथ जाना है…

यह कविता आधुनिक जीवन की भागदौड़, दौलत की अंधी दौड़ और सुकून से दूर होते इंसान की विडंबना को उजागर करती है। “मेरी-मेरी” में उलझे मनुष्य की मानसिकता और खोते मानवीय संबंधों पर यह एक गहरी, आत्ममंथन कराती हुई टिप्पणी है।

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जब चिड़िया चुग गई खेत !

तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में आगे बढ़ते हुए विनोद ने सफलता तो पा ली, लेकिन रिश्तों को समय देना भूल गया। करवाचौथ के दिन एक गजरा उसे एहसास दिला देता है कि प्यार बड़ी चीज़ों में नहीं, बल्कि उन छोटे पलों में छिपा होता है जिन्हें वह हमेशा टालता रहा। जब समझ आया, तब बहुत देर हो चुकी थी।

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माँ तो माँ होती है…

माँ का साथ शब्दों का मोहताज नहीं होता। कभी वह धूप में छाता बन जाती है, तो कभी जीवन की भीड़ में सहारा। उम्र भले ही शरीर पर अपना असर छोड़ दे, पर माँ की मौजूदगी वही सुकून देती है. निःशब्द, निःस्वार्थ और पूरी तरह सुरक्षित। माँ के साथ बिताया हर पल स्मृति बनकर जीवन भर साथ चलता है

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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पहले झगड़े थे, आज दूरी

हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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अजब दौर है…

नमिता गुप्ता, लखनऊ (उ.प्र) ” सरल बेटा, क्या हाल है तुम्हारा।”मैं ठीक हूँ दादाजी । अभी मै कालेज में हूँ। टेक केयर दादा जी… मैं फोन रखता हूँ।”विजय ने अपने मित्र को फोन मिलाया “हेलो!! गगन तू कैसा है ?”“यार ,मैं ठीक हूँ, तू अपनी बता।”” क्पा बताऊ यार,बुढ़ापे में जोड़ों में दर्द रहता है।…

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लड़कों से कोई नहीं पूछता ख़ैरियत

काफ़ी वक्त हो गया है,
अब कोई नहीं पूछता लड़कों से ख़ैरियत।
किसी को दिलचस्पी नहीं रहती यह जानने में कि वो ठीक हैं या नहीं।उनसे बस पूछा जाता है उनकी हैसियत, सैलरी और सफलता के पैमाने।ज़रा-सा पीछे रह जाने पर उनके हिस्से में आती हैं . आलोचना, तंज और एक लंबी चुप्पी,जिसमें उनका मन ख़ुद से ही लड़ता रहता है।

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घर में उदास बैठा पिता और मोबाइल में व्यस्त बच्चे, बदलते पारिवारिक रिश्तों का दृश्य

बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

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