
नमिता सिन्हा, बेंगलुरु
कभी शब्द काग़ज़ पर उतरते थे,
जैसे आत्मा संग सांस|
अब वही अक्षर स्क्रीन पर चमकते,
पर हैं बहुत उदास।
पन्नों की तहों में छुपी थी,
उँगलियों की गर्माहट|
अब ठंडी रोशनी में ढूँढते हैं,
हम वही पुरानी आहट।
स्याही में घुला था जो गहरा
एहसास है कहीं ना|
अब टाइप की रफ़्तार में खो गया,
हर जज़्बा नगीना।
किताबें थीं जैसे कोई,
ख़ामोश सखी हमराज़|
लैपटॉप बन गया है बस,
एक तीक्ष्ण तेज़ आवाज़।
वो मुड़े हुए कोने,
वो निशानियाँ अधूरी|
हर दाग़ में छुपी होती थी,
एक कहानी पूरी।
अब फाइलों के नामों में,
कैद हैं यादें सारी,
बिना खुशबू, बिना स्पर्श,
बस डिजिटल सवारी।
बदलाव ने सिखाया है,
जीने का नया ढंग|
पर कहीं भीतर अब भी,
सजता है पुराना ही रंग।
फिर भी बदलाव को हमने मान लिया,
नये दौर को पहचान लिया|
पर दिल के किसी कोने में,
किताबों ने अपना स्थान लिया|
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“नारी केवल देह नहीं”
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तुम लौट आओ…
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